उत्तर प्रदेश में अफीम की खेती के लिए जारी नई नीति से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। करीब डेढ़ माह की देरी से जारी नीति में उत्पादन का लक्ष्य बढ़ा दिया गया है, लेकिन खेती का क्षेत्रफल नहीं बढ़ाया गया। इससे किसानों में निराशा है और उन्हें आने वाले सीजन में अफीम की खेती घटने की आशंका है।
प्रदेश में बाराबंकी अफीम की खेती का सबसे बड़ा केंद्र है। इसके अलावा लखनऊ, अयोध्या, गाजीपुर, महाराजगंज, मऊ, बदायूं और शाहजहांपुर के कुछ किसान भी इसकी खेती करते हैं। पिछले वर्ष करीब 3700 किसानों को अफीम की खेती के लाइसेंस जारी किए गए थे। हालांकि, उत्पादन का निर्धारित लक्ष्य पूरा नहीं करने पर कई किसानों के लाइसेंस रद्द कर दिए गए थे। वर्ष 2026-27 के लिए अफीम की खेती की नीति करीब डेढ़ माह देर से जारी हुई है।
नई नीति के तहत उन्हीं किसानों को 10 आरी (करीब आठ बिस्वा) का लाइसेंस मिल सकेगा, जिन्होंने पिछले वर्ष न्यूनतम 4.4 किलो अफीम का उत्पादन किया था। अब अगले वर्ष लाइसेंस पाने के लिए इस सीजन में 5.9 किलो उत्पादन करना अनिवार्य होगा। इससे कम उत्पादन करने वाले किसानों को पांच आरी का सीपीएस पद्धति (सिर्फ पोस्ता दाना और डोडा चूरा उत्पादन) का लाइसेंस मिलेगा।
ऐसे मिलता है लाइसेंस: केंद्र सरकार की ओर से जारी नीति के आधार पर केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो किसानों को अफीम की खेती का लाइसेंस देता है। प्रदेश में गाजीपुर स्थित एकमात्र सरकारी अफीम एवं एल्कलॉइड कारखाने में किसानों की उपज खरीदी और संसाधित की जाती है। किसान अपनी उपज सरकार के अलावा किसी अन्य को नहीं बेच सकते हैं।
किसान इसे घाटे का सौदा बता रहे हैं। सिद्धौर के किसान राम अकबाल का कहना है कि उम्मीद थी कि इस वर्ष 10 आरी के लाइसेंस जारी होंगे, जिससे मध्यम वर्ग के किसानों को राहत मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं होने से निराशा हुई है। सुहावां के किसान चंद्रप्रकाश वर्मा, जयकरण वर्मा और राजित राम का कहना है कि पिछले वर्ष उत्पादन बढ़ाने के लिए काफी मेहनत की गई, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं मिला।