दंगाईयों ने तो केवल हाथ तोड़ा। सरकार तो जान लेने पर तुली है। पति बीमार है और चारपाई में ही पड़ा रहता है। अब टूटे हाथ से कैसे बच्चों और खुद का पेट पालूं ?
कहां से पति का इलाज कराऊं? यह सवाल केवल मुजफ्फरनगर दंगे की पीड़िता लिसाड़ गांव की हदीसा की ही नहीं है। यह हालत वहां मौजूद उन तमाम लोगों की है जोकि राहत शिविरों में रह रहे हैं या उन्हें जबरन हटा दिया गया।
सरकार ने राहत शिविर खाली कराए जाने की कार्रवाई की तो अब छत भी सिर से हट गई। वहीं कुटबा गांव के इमरान का कहना है कि सरकार पांच लाख रुपए देकर कह रही है कि जाकर नई जिंदगी शुरू करो।
मेरा उनसे कहना है कि इतने में वे हमें जमीन और घर दे दें। पेट भरने के लिए जमीन खरीदने में ही पूरा पैसा खर्च हुआ जा रहा है, छत कहां से लाएं।
सोमवार को गांधी भवन कैसरबाग में दंगों के पीड़ित और उनके पुर्नवास के लिए काम कर रही संस्थाएं जुटीं। यहां पीड़ित लोगों ने सरकार की राहत शिविर खाली कराए जाने की मनमानी की कहानी सामने रखी।
पीड़ितों का कहना था कि पहले तो मुआवजा ही नहीं मिल पा रहा था। अब तो शिविर से भी जाने केलिए दबाव जिला प्रशासन बना रहा है।
ऐसे में दंगाईयों से मार खाने के बाद लोग सरकारी प्रताड़ना का शिकार बन रहे हैं। इसके लिए गोष्ठी मुजफ्फरनगर की पुकार का आयोजन ज्वाइंट सिटीजन इनीशिएटिव (जेसीआई) ने किया था।
संस्थाओं की मांग थी कि सरकार पुर्नवास कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से चलाए। शपथ पत्र में गांव वापस नहीं जाने और सरकारी शिविर में नहीं रहने को ताकीद नहीं किया जाए।
गुजरात में हुए दंगों में काम करने वाली जन विकास संस्था के संस्थापक गगन सेठी का कहना था कि सरकार को आंतरिक विस्थापन की परिभाषा को समझना होगा।
विस्थापित जब अपना हक मांगते हैं तो सरकारी मशीनरी उनका शोषण करने लगती है। एपवा की कविता कृष्णन का कहना था कि यौन हिंसा पर सरकार चुप्पी साधे हुए है। एफआईआर के बाद भी गिरफ्तारी नहीं हो सकी।
गर्भवती महिलाएं तक बनी शिकार
जेसीआई की समन्वयक माहेश्वरी ने बताया कि हमारे सामने 72 गर्भवती महिलाओं के उत्पीड़न के मामले आए। प्रसव की हालत में महिलाओं को पीड़ा सहते हुए अपने घर को छोड़ना पड़ा।
सामान ढ़ोने से लेकर दूसरे काम वह कर रही थीं। इसकी वजह से प्रसव बाद नवजात की मौत जैसे मामले भी सामने आए।