‘अगर प्रधानमंत्री हमारे दुख, हमारे आंसू और हमारे जज्बात को महसूस करते हुए एक बार सीने से लगा लेते हैं... जैसे बड़ा भाई छोटे को लगा लेता है। ...और वे कहते हैं, मुनव्वर भाई चलिए हम और आप मिलकर इस देश को बिल्कुल ऐसा बना देंगे, जहां दंगा नहीं होने पाएगा तो मैं उनकी जूतियां तक उठा सकता हूं।’
ये शब्द हैं साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले मशहूर शायर मुनव्वर राना के। इस बयान पर आलोचना हुई तो उन्होंने कहा-‘सियासत नफरतों का जख्म भरने ही नहीं देती, जहां भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है।’
मुनव्वर राना ने कभी मजहबी सियासत से खुद को बचाने की बात कुछ यूं कही थी... ‘ख़ुदा बचाए हमें मज़हबी सियासत से, ये खेल खेल में पाले बदलती रहती है।’ लेकिन साहित्य अकादमी सम्मान को लेकर वे जिस तरह रोज निर्णय बदल रहे हैं, उसने उनके प्रशंसकों को हैरत में डाल दिया है।
अकादमी सम्मान लौटाते समय भले ही उन्होंने कहा हो मेरी खुद्दारी ने एहसान किया है मुझ पर, वरना जो जाते हैं दरबार में खो जाते हैं..., लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आने के बाद अब उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री अगर कहें तो सम्मान फिर वापस ले सकता हूं।
राना ने गुरुवार को ‘अमर उजाला’ से कहा कि मुझे प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया था लेकिन मैंने उनसे कहा है कि मेरे अकेले आने से कुछ नहीं होगा। कम से कम 10 साहित्यकारों को और बुलाया जाए। सबसे सम्पर्क होने के बाद हमें बुलाया जाएगा।
राना ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री कहेंगे और सभी सहमत होते हैं तो मैं अपना निर्णय बदल लूंगा। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों की कोई यूनियन नहीं है। वे रूठे हुए बच्चे की तरह हैं। हम सभी चाहते हैं कि देश के हालात सुधरें।
बड़ी संख्या में साहित्यकारों द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की राना ने पहले यह कहते हुए आलोचना की थी कि थके हुए साहित्यकार ही सम्मान लौटा रहे हैं लेकिन फिर एक चैनल पर बहस के दौरान उन्होंने साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने की घोषणा कर दी।