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'दंगे न होने का भरोसा मिले तो मोदी की जूतियां उठा लूंगा'

Sun, 25 Oct 2015 12:40 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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‘अगर प्रधानमंत्री हमारे दुख, हमारे आंसू और  हमारे जज्बात को महसूस करते हुए एक बार सीने से लगा लेते हैं... जैसे बड़ा भाई छोटे को लगा लेता है। ...और वे कहते हैं, मुनव्वर भाई चलिए हम और आप मिलकर इस देश को बिल्कुल ऐसा बना देंगे, जहां दंगा नहीं होने पाएगा तो मैं उनकी जूतियां तक उठा सकता हूं।’
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ये शब्द हैं साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले मशहूर शायर मुनव्वर राना के। इस बयान पर आलोचना हुई तो उन्होंने कहा-‘सियासत नफरतों का जख्म भरने ही नहीं देती, जहां भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है।’

मुनव्वर राना ने कभी मजहबी सियासत से खुद को बचाने की बात कुछ यूं कही थी... ‘ख़ुदा बचाए हमें मज़हबी सियासत से, ये खेल खेल में पाले बदलती रहती है।’ लेकिन साहित्य अकादमी सम्मान को लेकर वे जिस तरह रोज निर्णय बदल रहे हैं, उसने उनके प्रशंसकों को हैरत में डाल दिया है।
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अकादमी सम्मान लौटाते समय भले ही उन्होंने कहा हो मेरी खुद्दारी ने एहसान किया है मुझ पर, वरना जो जाते हैं दरबार में खो जाते हैं..., लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आने के बाद अब उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री अगर कहें तो सम्मान फिर वापस ले सकता हूं।

राना ने गुरुवार को ‘अमर उजाला’ से कहा कि मुझे प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया था लेकिन मैंने उनसे कहा है कि मेरे अकेले आने से कुछ नहीं होगा। कम से कम 10 साहित्यकारों को और बुलाया जाए। सबसे सम्पर्क होने के बाद हमें बुलाया जाएगा।

राना ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री कहेंगे और सभी सहमत होते हैं तो मैं अपना निर्णय बदल लूंगा। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों की कोई यूनियन नहीं है। वे रूठे हुए बच्चे की तरह हैं। हम सभी चाहते हैं कि देश के हालात सुधरें।

बड़ी संख्या में साहित्यकारों द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की राना ने पहले यह कहते हुए आलोचना की थी कि थके हुए साहित्यकार ही सम्मान लौटा रहे हैं लेकिन फिर एक चैनल पर बहस के दौरान उन्होंने साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने की घोषणा कर दी।
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चैनल पर चेक व चिह्र के साथ लौटाया था सम्मान

वे जिस प्रकार सम्मान चिह्न और चेक लेकर पहुंचे थे उसे सम्मान लौटाने के तरीके पर भी सवाल उठे। चैनल ने अगले दिन यह चिह्न और चेक अकादमी के कार्यालय में भिजवा दिया। अब राना ने फिर फैसला बदलने का संकेत दिया है।

राना सम्मान लौटाने वाले दूसरे साहित्यकारों से इस दृष्टि से भिन्न हैं कि उन्हें 2014 में तब सम्मान मिला था जब केंद्र में भाजपा की नई सरकार आ चुकी थी। इससे ऐसे साहित्यकारों की आलोचना करने वालों का यह तर्क अब नहीं चल पा रहा है कि सम्मान लौटाने वालों को पिछली सरकारों में ये सम्मान मिले थे।

बार-बार निर्णय बदलने से राना की छवि पर भी असर पड़ा है लेकिन राना कहते हैं कि मुझे अपनी छवि की चिन्ता नहीं है। अगर मेरी छवि को नुकसान पहुंचने के बावजूद देश के हालात बेहतर होते हैं तो मेरे लिए वह अधिक महत्वपूर्ण है। यह छवि किस काम की है, जो हासिल किया है सब यहीं रह जाएगा।

राना कहते हैं कि इस छवि के कारण कभी ऐसा नहीं होता है कि आप बनिए के यहां जाएं और वह आपको मुफ्त में राशन दे दे, या आप अस्पताल जाएं और आपका मुफ्त में इलाज हो जाए। फिर इस छवि की क्या चिन्ता?
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