अखिलेश यादव की अपनों से लड़ाई फिलहाल खत्म होती नजर नहीं आ रही। चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और चुनाव चिह्न की लड़ाई में तो अखिलेश बखूबी पास हो गए, पर असल परीक्षा तो अब होनी है।
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सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश को विरोधियों की चुनौतियों के साथ ही ‘अपनों’ से भी जूझना होगा। अखिलेश-राहुल गांधी के साझा रोड शो वाले दिन ही पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने गठबंधन का विरोध और चुनाव प्रचार से अलग रहने की बात कहकर इसके साफ संकेत दे दिए हैं।
सपा की चुनौती मुलायम के गृह जनपद इटावा से ही शुरू हो गई है। यहां ‘मुलायम के लोग’ अलग दफ्तर चला रहे हैं, तो फिरोजाबाद, एटा में मुलायम के नजदीकी विधायक बागी होकर मैदान में हैं। सपा ने इटावा के विधायक रघुराज सिंह शाक्य का टिकट काट दिया है।
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वे पार्टी में मुलायम सिंह के अपमान का आरोप लगाते हुए सपा से इस्तीफा दे चुके हैं। वहां सपा के जिलाध्यक्ष भी बदले जा चुके हैं। इटावा में ‘मुलायम के लोग’ नाम से कार्यालय खोलकर सपा के बागियों (मुलायम समर्थकों) की अलग गतिविधियां शुरू हो गई हैं।
शिवपाल ने भी की 'अपनों से धर्मयुद्घ' की बात
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व शिवपाल यादव
- फोटो : amar ujala
शिवपाल सिंह यादव हालांकि सपा के प्रत्याशी हैं, लेकिन वे ‘अपनों से धर्मयुद्ध’ की बात कह चुके हैं। उनके इर्द-गिर्द मुलायम समर्थकों का जमावड़ा है। अखिलेश के नजदीकी समर्थक उनसे दूरी बनाए हुए हैं। यही स्थिति इटावा के आसपास के जिलों में देखने को मिल रही है।
विधायक ही नहीं कई प्रमुख नेता भी परिवार के विवाद में खेमों में बंट गए हैं। मुलायम के करीबियों की चुनौतियां सिर्फ मध्य यूपी नही पश्चिम से पूर्वांचल तक रहेंगी।
पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी, नारद राय, रामपाल यादव समेत दूसरे दलों में जाने वाले उनके करीबी नेताओं की फेहरिस्त अब लंबी हो चली है।
नेतृत्व परिवर्तन से टिकट कटने तक... चुनौतियां बढ़ती ही गईं
अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
स्थापना के रजत जयंती वर्ष में हो रहे 17वें विधानसभा के चुनाव से पहले ही सपा नेतृत्व परिवर्तन का गवाह बना, पर इसकी राह कटीले रास्तों और अपनों की हार से होकर गुजरी।
1992 में पार्टी की स्थापना काल से राष्ट्रीय अध्यक्ष चले आ रहे मुलायम की जगह एक जनवरी को अखिलेश को अध्यक्ष चुन लिया गया। शिवपाल सिंह यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। इसके बाद सपा की आंतरिक लड़ाई गहरा गई। पार्टी और निशान पर हक की लड़ाई भी अखिलेश के हाथ लगी।
अखिलेश के लिए राहत की बात इतनी है कि पार्टी के दो खेमों में बंटने के बावजूद मुलायम अपने प्रत्याशी नहीं उतार रहे हैं, लेकिन टिकट से वंचित उनके नजदीकी लोगों ने दूसरे ठिकाने ढूंढ लिए हैं। वे मुलायम के अपने साथ होने का दावा कर रहे हैं।
मुलायम के गढ़ में लग न जाए सेंध
मुलायम सिंह यादव
- फोटो : amar ujala
मुलायम का गढ़ समझे जाने वाले इटावा, मैनपुरी, औरैया, एटा, कासगंज, फीरोजाबाद जैसे यादव पट्टी वाले जिलों में सपा के पारिवारिक विवाद से नुकसान की आशंका है। कांग्रेस से गठबंधन पर मुलायम के हाल के रुख से संदेश गया है कि वे अखिलेश के कामकाज से नाखुश हैं।
विधानसभा चुनाव को लेकर उनकी सहमति से फैसले नहीं हो रहे हैं। वे अपने नजदीकी नेताओं के एक-एक कर दूसरे दलों का रुख करने से भी आहत हैं। यही हाल रहा तो इस बार उनके गढ़ में सेंध लग सकती है।
जनता देगी मुलायम विरोधियों को जवाब
एटा के विधायक आशीष यादव को मुलायम का मजबूत समर्थक माना जाता है। उनके पिता रमेश यादव विधान परिषद के सभापति और मुलायम के करीबी व रिश्तेदार भी हैं। सपा की लड़ाई में जब मुलायम सिंह पर पहला हमला हुआ तो आशीष खुलकर सामने आए थे। उन्होंने रामगोपाल यादव और उनके समर्थकों पर गंभीर आरोप लगाए थे।
मुलायम, शिवपाल का नजदीकी होने कारण सपा ने आशीष का टिकट काट दिया है। वे अपनी सीट पर लोकदल के चुनाव चिह्न (खेत जोतता किसान) पर चुनाव मैदान में हैं। आशीष कहते हैं कि नेताजी से नजदीकी के चलते उनका टिकट काटा गया है। चुनाव में मुलायम विरोधियों को जनता माकूल जवाब देगी।
मुलायम के समधी और जसराना (फैजाबाद) के विधायक रामबीर सिंह का भी टिकट कट गया है। विवाद में वे भी मुलायम के पक्ष और रामगोपाल के खिलाफ खड़े हुए थे। उनका कहना है कि मुलायम के करीबी लोगों के खिलाफ साजिश की गई है।
1993 से उनकी जीत का मार्जिन बढ़ा है, लेकिन टिकट काट दिया गया। वे भी लोकदल के सिंबल पर चुनाव मैदान में हैं। उनका कहना है कि साजिश का जवाब जनता चुनाव में देगी।
मुलायम प्रचार से दूर रहे तो बदलेगी स्थिति
सियासत के जानकार मान रहे हैं कि मुलायम ने प्रचार से इन्कार करके सपा की मुसीबत बढ़ाई है। पश्चिमी और मध्य यूपी के 8-10 यादव बहुल जिले ऐसे हैं, जिनमें मुलायम 70 के दशक से ही सक्रिय रहे हैं। ये वे जिले हैं, जिनमें कांग्रेस की भूमिका बहुत ज्यादा नहीं है। इन जिलों में उनका निजी जुड़ाव काफी मजबूत है।
इटावा के आसपास के इन जनपदों उनकी निष्क्रियता सपा के लिए परेशानी खड़ा कर सकती है। यदि उनका रुख सपा के बागी विधायकों या दूसरे नेताओं के पक्ष में हुआ तो स्थिति बदल भी सकती है। इन जिलों में सपा को इकतरफा कामयाबी मिली थी।