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मंदिर बनवाने के लिए अब नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा करेंगे साधु-संत

Wed, 17 Jun 2015 02:02 AM IST
धीरेंद्र सिंह/अमर उजाला, अयोध्या
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क्या नरेंद्र मोदी सरकार से बाबरी मस्जिद व राममंदिर विवाद को निपटाने में रुचि नहीं ले रही है? यह सवाल जितना हिंदू पक्ष में वायरल हुआ है, उतना ही मुसलमान में भी।
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इसी के साथ राममंदिर निर्माण के मुद्दे पर विहिप व संत-धर्माचार्यों ने नरेंद्र मोदी की घेराबंदी तेज कर दी गई है। राममंदिर के लिए कानून बनाने की हुंकार भरने के साथ दबाव बनाने के लिए सुग्रीव जैसा मदांध राजा को सबक सिखाने के लिए लक्ष्मण रूपी ताकत जुटाने की बातें हो रही हैं। हालांकि इसके पीछे कई सियासी मायने भी हैं।

लोकसभा चुनाव में हाशिए पर डाले गए सांसद विनय कटियार और पूर्व सांसद महंत रामविलास दास वेदांती की सीधे-सीधे मोदी पर तल्ख टिप्पणी इसी का संदेश दे रही है।
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वेदांती ने मगंलवार को प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी के अयोध्या आकर रामलला के दर्शन नहीं करने को मुद्दा बना दिया है। कहा कि वे काशी, नेपाल, चीन,बांग्लादेश तक दर्शन-पूजन कर आए, लेकिन भाजपा की प्राणवायु अयोध्या क्यों नहीं आए?

राममंदिर आंदोलन में बजरंगदल के संस्थापक रहे सासंद विनय कटियार ने एक सप्ताह पहले मोदी पर सवाल उठाए, तो इतना असरदार नहीं था, जितना कि मंगलवार को रामनगरी में जुटे विहिप के शीर्ष नेताओं व धर्माचार्यों की चिंता सामने आने के बाद।

दोनों पक्ष चाहते हैं इस मुद्दे का हल

रामजन्मभूमि न्यास की बैठक में सबकुछ छोड़ अब पहला एजेंडा मोदी सरकार की राममंदिर की उपेक्षा पर घेराबंदी हो गई है। विनय कटियार के सवाल ने अयोध्या में संतों का साथ नहीं पाया। इसके लिए वे काफी हद तक खुद जिम्मेदार हैं।

यही वजह है कि बाबरी मस्जिद की लड़ाई लड़ रहे 95 वर्षीय मुद्दई हाशिम अंसारी का कटियार पर निशाना सभी समुदायों को अच्छा लगा था।मंगलवार को हाशिम ने न्यास की बैठक पर कुछ नहीं बोला।

लेकिन मोदी सरकार से हिंदू के साथ मुसलमान पक्ष भी बाबरी मस्जिद-राममंदिर विवाद का हल जल्द चाहता है। यहां आए गृहमंत्री राजनाथ सिंह के राज्यसभा में बहुमत न होने की मजबूरी गिनाने के बयान को जहां हिंदू पक्ष अस्वीकार करता दिख रहा है।

वहीं मुसलमान पक्ष कानून बनाने के रास्ते को असंवैधानिक ठहरा रहा है। चाहता है कि मोदी सरकार बस एक एहसान करें कि सुप्रीम कोर्ट में डे-टू-डे पैरवी का रास्ता साफ करे।

बीते पखवारे यहां आए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सफाई दी कि चूंकि राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं है, इसलिए राम मंदिर के लिए कानून बनाना संभव नहीं है।

जबकि विहिप का कहना है कि राम मंदिर निर्माण संबंधी कानून तो संसद के ऐक्ट संख्या-33 (1993) के रूप में पारित हो चुका है, जिसमें कहा गया है कि अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के समाधान के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था व विभिन्न वर्गों के बीच सद्भाव की रक्षा हो और भारत में समान भातृत्व का विकास हो सके।

इसलिए इस क्षेत्र को अधिग्रहीत करना आवश्यक है। तब पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। उस समय भाजपा इस कानून की समर्थक थी।

क्या बोले इससे जुड़े पक्षकार

बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी, न्यास की बैठक पर कुछ नहीं बोलूंगा। मस्जिद हमारी थी और रहेगी। इसका संसद फैसला नहीं कर सकता। पहले गुनहगारों को सजा मिलनी चाहिए।

सरकार और संसद कुछ करना चाहती है तो हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में टाइटिल विवाद जल्द निस्तारित हो, इसके लिए प्रस्ताव लाए। मस्जिद गिराने वाले और मंदिर बनाने वालों से जुड़े मुकदमों की सुनवाई तेज कर सजा दिलाए।


रामजन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य महंत रामविलास दास वेदांती का कहना है,रामजन्मभूमि न्याय की बैठक में मेरा प्रस्ताव है कि भाजपा ने इसे अपने चुनावी घोषणा पत्र में रखा। जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाई।

हरिद्वार की 2013 की बैठक में संत-धर्माचार्यों ने केंद्र सरकार से कानून बनाकर राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने का प्रस्ताव पास किया था। इस मुद्दे पर भाजपा ने वोट लिया, हमने एक साल तक कुछ नहीं कहा।

अब देश-प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि भाजपा सरकार मंदिर निर्माण के लिए क्या करेगी। इसी मानसून सत्र में मोदी सरकार से मांग है कि राममंदिर निर्माण का प्रस्ताव लाए, जो विरोधी होंगे, जनता उन्हें पहचानेगी और सबक सिखाएगी।

अनि अखाड़ा के महंत भाष्कर दास के प्रतिनिधि हरदयाल ने कहा, भाजपा ईमानदारी शुरू से नहीं दिखा रही है, उसकी हालत राम के राजनीतिक भक्त सुग्रीव जैसी है।
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‘भाजपा करती रही राजनीति’

निर्मोही अखाड़ा के महंत भास्कर दास के प्रतिनिधि पुजारी रामदास ने कहा, गृहमंत्री राजनाथ सिंह को घोषणा करनी चाहिए थी कि 2017 में राज्यसभा में बहुमत के बाद हमारी सरकार करोड़ों हिदुओं की आस्था का राममंदिर अयोध्या में बनवाएगी।

लेकिन भाजपा तो सिर्फ राजनीति करती रही है, अगले चुनाव में इसका सबक जनता देगी। अबतक देखा जाए तो कांग्रेस सरकार ने ही राममंदिर के लिए सार्थक काम किया है। अब हमारा विश्वास भगवान राम और सुप्रीम कोर्ट पर है।

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के पक्षकार हाजी महबूब का कहना है, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, वे यदि सुप्रीम कोर्ट में जल्द व डे-टू-डे सुनवाई का प्रस्ताव भेजें, तो मुसलमान स्वागत करेगा।
हाईकोर्ट का फैसला सभी पक्षों को स्वीकार्य नहीं है। मगर रामजन्मभूमि न्यास, तोगडिय़ा, सिंघल और ज्ञानदास कौन हैं? इनकी हैसियत मुकदमें में क्या है?

ये लोग जिस दिन एक ईंट रख देंगे, मैं अयोध्या छोड़ दूंगा। टाइटल सूट मुसलमानों व निर्मोही अखाड़ा के बीच है। हां, कोर्ट से बाहर जफरयाब जिलानी ने भी मामले के हल की बात कही है, हमारी बाबरी मस्जिद की जगह छोड़कर मंदिर बनाएं, हमें आपत्ति नहीं है।

वहीं भाजपा के राज्यसभा सांसद, विनय कटियार का कहना है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के एक वर्ष हो गए हैं। अब समय आ गया है कि राम मंदिर निर्माण पर बातचीत शुरू हो।

बातचीत से हल न निकले तो लोकसभा में भूमि अधिग्रहण बिल की तरह कानून बनना चाहिए।
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