एक के बाद एक कार्यक्रम तय होने से भाजपा कार्यकर्ता पसीने-पसीने हो रहे हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि कौन सा मोर्चा संभालें और कौन सा छोड़ दें?
एक मोर्चा संभालते हैं तो दूसरा खाली रह जाता है। दूसरे पर ध्यान देते हैं तो तीसरे की अनदेखी का खतरा दिखाई देता है।
किसी मोर्चे पर कोई कमी रह जाती है तो नेताओं की नाराजगी का खतरा। असफलता का आरोप और विरोधी गुट की तरफ से टांग खिंचाई।
'मोदी की चले तो मुस्लिमों को देश से ही निकाल दें'
नतीजतन भाजपा के कई अभियान सिर्फ कागजों पर ही सिमटकर रह जा रहे हैं। अभी हाल की कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो यह बात साबित हो जाती है।
पार्टी ने 1 से 15 अक्तूबर तक बूथ समितियों के सत्यापन का फैसला किया, पर इसकी घोषणा हुई चार दिन बाद 4 अक्तूबर को। उस समय क्षेत्रीय बैठकें चल रही थीं। ऐसे में इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि क्षेत्रीय बैठकों के दौरान बूथ समितियों के सत्यापन के लिए कोई कैसे जा पाएगा।
'बेनी बयान देने की बीमारी से ग्रस्त'
नतीजतन बूथ समितियों के सत्यापन का काम कागजों तक सिमटकर रह गया। पार्टी के ही लोगों का कहना है कि बूथों पर जाकर देखा जाए तो सारी असलियत सामने आ जाएगी।
कुछ जगह भले ही बूथ समितियां सक्रिय रूप से काम करती मिल जाएं अन्यथा सभी जगह खाली ही मिलेंगी।
घोषित हो गईं मोदी की रैलियों की तारीखें
क्षेत्रीय बैठकों और बूथ समितियों के सत्यापन का काम शुरू नहीं हो पाया कि अक्तूबर में ही पार्टी के कार्यकर्ताओं पर मतदान केंद्रों पर वोटर लिस्टों के पुनरीक्षण में सक्रिय भागीदारी की जिम्मेदारी डाल दी गई।
सूची से फर्जी मतदाताओं के नाम हटवाने और भाजपा समर्थक मतदाताओं के नाम शामिल करवाने का निर्देश दिया गया।
यह काम आगे बढ़ता कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार व गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की यूपी में तीन रैलियों की तारीखें घोषित हो गईं।
इसी के साथ एक बार फिर बदल गई भाजपा की प्राथमिकता। कार्यकर्ताओं व क्षेत्रीय पदाधिकारियों के कंधों पर रैलियों की तैयारी और भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी आ गई। मतदाता सूची से नाम कटवाने और जुड़वाने का ऐलान हवा में ही रह गया।
लोहा जुटाने की जिम्मेदारी
मोदी की घोषित हो चुकी रैलियों में अभी झांसी व बुंदेलखंड की रैलियां बाकी हैं। इसके साथ ही 24 दिसंबर से पहले सूबे में मोदी की पांच रैलियां और होनी हैं।
...तो सपा के मंत्रियों की कुर्सी छीन लेंगे मुलायम
इसी बीच भाजपा कार्यकर्ताओं को मोदी के ऐलान के मुताबिक, सरदार वल्लभ भाई पटेल की गुजरात में बनने वाली सबसे ऊंची लौह प्रतिमा के लिए हर किसान के परिवार से खेती-किसानी में उपयोग हो चुके लोहे का कोई औजार दान में लेने का काम करना है। ऐसे में कार्यकर्ता पशोपेश में हैं कि किस कार्यक्रम में जुटें और किसे छोड़ दें।
समीक्षा की प्रक्रिया भी ठप
भाजपा के एक पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष कहते हैं कि मामला सिर्फ पार्टी तक सीमित नहीं है। अगस्त से पूरे सितंबर विहिप के कार्यक्रम चलते रहे।
घोषित तौर पर ये कार्यक्रम थे तो विहिप के, पर वास्तविकता यह है कि इन कार्यक्रमों में भी भाजपा कार्यकर्ताओं को जुटना पड़ा।
उधर, पार्टी के एक बुजुर्ग नेता का कहना है कि समस्या भाजपा के भीतर संवाद व समन्वय का अभाव है। पहले कार्यक्रमों की समीक्षाएं होती थीं।
कहीं कमी होने पर उसे सुधार लिया जाता था, पर आज यह प्रक्रिया भी ठप हो गई है। ऊपर से पार्टी के भीतर इतने मोर्चा व प्रकोष्ठ बन गए हैं कि हर मोर्चा व प्रकोष्ठ किसी न किसी कार्यक्रम की घोषणा या बैठकें करता रहता है।
सदस्यता अभियान और न अन्य काम
इन बुजुर्ग नेता का तर्क ठीक है। जब भाजपा के कई कार्यक्रम घोषित हो चुके थे, उसी बीच भारतीय जनता युवा मोर्चा ने सदस्यता अभियान की घोषणा कर दी है। अन्य कई कार्यक्रम भी घोषित किए गए हैं।
ये कार्यक्रम जमीन पर उतरते नहीं दिख रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि युवा मोर्चा के कार्यक्रम और 10 लाख युवाओं को भाजपा से जोड़ने का ऐलान भी कागजों में सिमटकर रह जाए।
इस स्थिति ने केवल कार्यकर्ताओं को ही असमंजस में नहीं डाला है बल्कि कई ऐसे मुद्दे भी भाजपा के हाथ से निकल गए जिन पर वह सरकार को घेर सकती थी।
उदाहरण के लिए अति पिछड़ों व अति दलितों को आरक्षण भाजपा का मुख्य एजेंडा रहा है, लेकिन जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर ऐसा फैसला दिया, जिसे भाजपा मुद्दा बना सकती थी, तब वह इस पर कुछ कर ही नहीं पाई।
लखनऊ की और खबरों के लिए क्लिक करें यहां