मुलायम, अखिलेश और मोदी गुजरात और यूपी के नाम पर जमकर रस्साकसी कर रहे हैं, लेकिन असलियत तो ये है कि तीनों ही बड़े नेता या तो सच्चाई से अनजान हैं या फिर जनता को लुभाने के लिए फरेब की राजनीति कर रहे हैं।
चुनावी माहौल में जब भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने हर मोर्चे पर यूपी की दयनीय हालत का खाका खींचा तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें बहस की चुनौती दे डाली।
यूपी की गरीबी पर वार करने वाले मोदी को जवाब देते हुए मुलायम ने कहा, ‘गुजरात की पूरी आबादी के बराबर लोग तो यूपी में खुशहाल हैं।’
यकीनन, दिलासा देने के नाम पर मुलायम का यह दावा खुशफहमी पैदा कर सकता है। पर, तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि गुजरात की आबादी के बराबर लोग यूपी में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं।
यही नहीं, प्रति व्यक्ति प्रति माह उपभोक्ता खर्च व गरीबी रेखा के प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय में भी हम गुजरात से कहीं पीछे हैं।
अखिलेश, गुजरात से वाकई पीछे है यूपी
योजना आयोग ने प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय के आधार पर देश में गरीबी मापने के लिए नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन से 2011-12 में सर्वेक्षण कराया था।
इस सर्वे में 2009 में प्रो. सुरेश डी. तेंदुलकर के नेतृत्व में बनी विशेषज्ञ कमेटी ने गरीबी के तय मानकों को केंद्र में रखा। सर्वे के अनुसार देश में गरीबी रेखा पर रहने वाले प्रति व्यक्ति का उपभोक्ता व्यय गांवों में 816 व शहरों में 1000 रुपये है।
यह आंकड़ा गुजरात के गांवों में 932 व शहरों में 1152 रुपये है जबकि यूपी के गांवों में 768 व शहरों में 941 रुपये है। अगर गरीबी-अमीरी के खांचे से निकलकर दोनों सूबों में प्रति व्यक्ति सामान्य खर्च की भी बात करें तो यूपी राष्ट्रीय स्तर से काफी पीछे है।
देखिए, क्या कह रहे हैं आंकड़े
प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय (गरीबी रेखा से नीचे)
कहां...........ग्रामीण..........शहरी
देश................816................1000
गुजरात...........932................1152
उत्तर प्रदेश.......768.................941
प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय (सामान्य)
कहां.......ग्रामीण.....शहरी
देश..........1287..........2477
गुजरात.....1430...........2472
यूपी.........1072..........1942
गरीबी रेखा से नीचे वाली आबादी
कहां..........ग्रामीण.....शहरी......कुल
गुजरात........75.35......26.88........102.23
उत्तर प्रदेश....479.35.....118.84.......598.10
(सभी आंकड़े लाख में)
यूपी के गरीब भर देंगे मोदी का गुजरात
यूपी की गरीबी बताने के लिए यह तथ्य ही काफी है कि यहां के अति गरीबों से ही एक पूरा गुजरात बस सकता है। यूपी में 5.98 करोड़ आबादी गरीबी रेखा से नीचे है जबकि गुजरात की कुल आबादी करीब 6 करोड़ है।
सच तो यह भी है
नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों को मिलाकर गुजरात की कुल आबादी के 16.63 फीसदी यानी एक करोड़ दो लाख लोग ही गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं।
जबकि यूपी में 29.43 फीसदी आबादी यानी 5.98 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। इस सर्वे के अनुसार पूरे देश में करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं।
मोदी के गुजरात का एक सच यह भी
पूरे देश में गुजरात के विकास मॉडल का ढिंढोरा पीट रहे मोदी के राज्य की एक तस्वीर यह भी है कि वहां के आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों से यही लगता है कि साक्षरता, मातृ-शिशु मृत्यु दर, कुपोषण आदि में यूपी व गुजरात की तस्वीर कोई बहुत अलग नहीं है।
गिरि विकास अध्ययन संस्थान, लखनऊ के पूर्व निदेशक एके सिंह कहते हैं कि आज भी गुजरात में करीब आधे बच्चे व 37 फीसदी माताएं कुपोषण के दायरे में जीने को विवश हैं।
2010 के सर्वे के अनुसार गुजरात में एक हजार बच्चों में से 44 की मौत पैदा होते ही हो जाती है। यूपी में यह संख्या 61 है। साक्षरता दर 79 प्रतिशत है तो यूपी में भी यह 70 को पार कर गई है।
एके सिंह बताते हैं कि गुजरात के मंत्री भले ही प्रवासी मजदूरों को गरीबी की वजह बताएं पर हकीकत यह है कि सरकार ही उन्हें गरीब बना रही है। नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार गुजरात में 89 प्रतिशत पुरुष व 90 फीसदी महिलाएं असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं।
इन कामगारों को शहरी क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी 106 रुपये व ग्रामीण क्षेत्र में 83 रुपये ही मिलती है, जबकि देश में न्यूनतम मजदूरी की दर इससे लगभग दोगुनी है। जाहिर है, गुजरात में अमीरी की रोशनी महज 10-11 प्रतिशत लोगों को ही नसीब है।
ये है यूपी-गुजरात की असली तुलना
यूपी योजना आयोग के उपाध्यक्ष नवीन चंद्र वाजपेयी का कहना है कि यूपी व गुजरात की तुलना कैसे हो सकती है। तुलना तो बराबर के हालात में होती है। इस बारे में वह निम्नलिखित तर्क देते हैं:
भौगोलिक: यूपी का भूभाग 2.42 लाख वर्ग किमी है जबकि गुजरात का सिर्फ पौने दो लाख वर्ग किमी। जनसंख्या में हम गुजरात से तीन गुना से भी ज्यादा हैं।
औद्योगिक: गुजरात का बिजनेस क्लास सदियों से एंटरप्रेन्योर रहा है, यूपी में सिर्फ ट्रेडिंग पर जोर रहा। फिर गुजरात के साथ समुद्री किनारों से लेकर प्राकृतिक संसाधनों तक काफी समृद्धि है।
प्रति व्यक्ति आय: हमने देश को प्राइम मिनिस्टर दिए पर हमें प्राइम प्रोजेक्ट नहीं मिले। पहली व दूसरी पंचवर्षीय योजना के दस वर्षों में तो कोई भारी या मध्यम दर्जे का उद्योग मिला ही नहीं। इस सबका असर यह हुआ कि 1951 में देश की प्रति व्यक्ति आय 267 रुपये के मुकाबले यूपी की प्रति व्यक्ति आय 259 रुपये यानी सिर्फ तीन फीसदी कम थी। 2012-13 में देश व सूबे की प्रति व्यक्ति आय का यही फर्क 68747/ 33529 रुपये यानी 51 फीसदी हो गया।
जलवायु: वहां की जलवायु हमारे यहां की तरह एक्सट्रीम नहीं है, एकरूपता रहती है।
नेता जी, पढ़िए क्या कहते हैं विशेषज्ञ
गुजरात में कम गरीबी की मुख्य वजह यह है कि वहां शहरी आबादी करीब 40 फीसदी है जबकि उत्तर प्रदेश में सिर्फ 22 प्रतिशत लोग शहरों में रहते हैं। गुजरात के गांवों में गरीबी का आंकड़ा देखने से भी यह बात साफ हो जाती है। दूसरी बड़ी वजह संसाधन हैं। उनके पास सी-पोर्ट है, तेल के भी भंडार हैं और सबसे बड़ी बात वहां के समाज में लंबे समय से एंटरप्रेन्योर की प्रवृत्ति है।
(एके सिंह, पूर्व निदेशक, गिरि विकास अध्ययन संस्थान, लखनऊ)
एनएसएसओ ने अपने सर्वे का मानक प्रति व्यक्ति व्यय को बनाया है। चूंकि गुजरात की प्रति व्यक्ति आय यूपी से काफी ज्यादा है और उपभोग पर खर्च आय पर ही निर्भर होती है, इसलिए खर्च का औसत भी ज्यादा आता है। इसीलिए वहां गरीबी का प्रतिशत कम है।
(बनारसी सिंह, सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक, अर्थ एवं संख्या विभाग, उप्र सरकार)