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सुंदरियों के खेल में पहले भी हुआ है सियासत का मुंह काला

Fri, 30 Aug 2013 02:37 AM IST
लखनऊ/मनोज श्रीवास्तव
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अपने काले कारनामों के कारण कुछ जेल में हैं तो कुछ राजनीतिक परिदृश्य से ही बाहर हो गए। कुछ को एक दल ने ठुकराया तो दूसरे ने गले लगा लिया।
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लोक-लाज के लिए भले ही ऐसे लोगों से कुछ दिन के लिए कुछ दूरी बना ली जाए पर इन्हें सियासत से बेदखल कर देने की संकल्पशक्ति किसी राजनीतिक दल ने अब तक नहीं दिखाई।

सत्ता से सुंदरियों का नाता पुराना है। प्रदेश की सत्ता भी इस राजरोग से अछूती नहीं रही। क्या बडे़ नेता और क्या विधायक, सुंदरियों के मोहपाश से कोई भी खुद को बचा नहीं पाए।
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पर गुजरा वक्त यही बताता है कि सुंदरियों से रिश्तों को लेकर सुर्खियों में आने के बाद कुछ राजनेताओं का चमचमाता पॉलिटिकल कॅरिअर समय के दलदल में फंसकर लड़खड़ा अवश्य गया, पर सीट जिताऊ लोग इस दल से उस दल में जाकर या किसी अन्य कौशल से अपने आप को प्रासंगिक बनाने में कामयाब हो गए। सीट जिताऊ क्षमता उनके सारे काले कारनामों को ढंक देती है।

यूपी में तीन बार मुख्यमंत्री, केंद्र में महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री, दो प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा एक राज्य के गवर्नर
रहे देश के एक बड़े राजनेता को इन्हीं सुंदरियों के कारण आभाहीन और बेआबरू होकर सत्ता के आलोक से गुमनामी के अंधियारों में लौटने को मजबूर होना पड़ा।

एक और मुख्यमंत्री जिनकी चरण रज लेने के लिए एक दौर में लोग बेताब रहते थे, अपनी महिला मित्र को लेकर चर्चा में आने के बाद न केवल पार्टी में बेगाने हो गए बल्कि समर्थकों की नजर भी पलट गई।

आज वो एक बार फिर मुख्यधारा में दिखने की फिराक में हैं। कई कांग्रेसी सरकारों में नंबर दो की हैसियत रखने वाले एक पूर्व मंत्री को अपनी एक खिलाड़ी दोस्त (अब पत्नी) के कारण इतना अपयश झेलना पड़ा कि सियासत और समाज दोनों में अपनी हनक गंवा बैठे।

कविता चौधरी कांड ने सपा की पिछली सरकार के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हलचल मचा दी थी। कारण कांड की लपेट में आने वाले तीनों तत्कालीन मंत्री चौधरी बाबूलाल, मेराजुद्दीन और किरनपाल सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से थे। किरनपाल को तो मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था।

वह उस कांड के बाद कोई चुनाव नहीं जीत पाए। अमूमन ऐसे मामलों में बदनाम वही लोग होते हैं जिनके  सुंदरियों से रिश्तों के मामले पुलिस या अदालत की चौखट तक पहुंचने के कारण सुर्खियों में आते हैं।

तमाम ऐसे ‘खिलाड़ी’ हैं जो अपने कौशल से इन मामलों को लेकर सुर्खियों में तो नहीं आए लेकिन उनकी रस भरी चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में अक्सर चटखारों के साथ सुनने को मिलती हैं।

कुछ लोग अर्श से फर्श पर जरूर पहुंच गए होंगे पर मौजूदा राजनीति में ऐसे मामले अमूमन आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के तहत ही तूल पकड़ते हैं।

मसलन पिछली सरकार के दौरान बलात्कार के एक मामले में नाम आने पर बुलंदशहर के सपा नेताओं, खासतौर से महिलाओं ने बसपा के तत्कालीन एमएलए भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित के खिलाफ खूब विरोध प्रदर्शन किया।

हालांकि कुछ दिनों बाद न केवल गुड्डू पंडित को सपा में शामिल कर लिया गया बल्कि टिकट भी दे दिया। अब वह सपा का एमएलए है। सपा नेतृत्व ने यह कहकर पंडित को क्लीन चिट दे दी थी कि उन्हें अदालत ने बरी कर दिया है।

बुलंदशहर के एक स्थानीय नेता कहते हैं-हकीकत सबको मालूम है, पर नेतृत्व ने जब क्लीन चिट दे ही दी तो किसमें हिम्मत है कि पुरानी बातों को जिंदा करे। ऐसा ही मामला फैजाबाद के पूर्व बसपा विधायक आनंद सेन का है।

विधानसभा में शशि मर्डर केस खुद मुलायम सिंह ने उठाया था, आनंद उसमें आरोपी थे, काफी हंगामा हुआ था। पर बाद में स्थितियां बदल गईं और आनंदसेन के पिता मित्रसेन सपा के विधायक भी हो गए और फैजाबाद से पार्टी के उम्मीदवार भी। रुदौली से भाजपा विधायक रामचंदर यादव कहते हैं कि सपा में अब आनंदसेन की करतूतों को लेकर एक शब्द चर्चा तक नहीं होती।

गोवा में कॉलगर्ल के साथ 55 वर्षीय सपा विधायक महेंद्र कुमार सिंह उर्फ झीन बाबू की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर सेक्स और सत्ता के रिश्तों पर चटखारों के साथ चर्चाएं तेज हो गई हैं।

पिछली विधानसभा में हरैनी बलात्कार कांड के सिलसिले में जब पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी को लेकर हंगामा हो रहा था तब वरिष्ठ भाजपा सदस्य ओमप्रकाश सिंह ने कहा था कि मेरी समझ में नहीं आता कि इस जेहनियत के लोग विधानसभा तक पहुंच कैसे जाते हैं, ऐसे लोगों को टिकट क्यों दिया जाता है?

सदन की सारी महिला सदस्यों को चाहिए कि ऐसे लोगों को विधानसभा में ही घुसने ही न दें, रास्ता रोक दें। पर क्या राजनीति कोई सीख लेगी? क्या सदन की महिला सदस्य ऐसे विधायकों को सबक सिखाने के लिए कोई पहल करेंगी? यक्ष प्रश्न यही है।

जिन लोगों के पास कोई सोशल कमिटमेंट नहीं हैं, पैसे के जोर या आपराधिक दबदबे के कारण राजनीति में आ रहे हैं, वे ऐसा ही करेंगे।

आनंद सेन यादव
आरोप: आनंद सेन पर फैजाबाद की एक विधि स्नातक छात्रा शशि का अपहरण कर हत्या का आरोप था।
क्या थे: उस समय फैजाबाद के मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक और बसपा सरकार में खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री थे।
अब क्या हैं: आरोपों में घिरे आनंद सेन को बसपा ने किनारे कर दिया था और जेल में बंद होने की वजह से टिकट भी नहीं दिया गया था। मौजूदा समय में वह जेल से बाहर हैं पर राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हैं।
यह था मामला: अक्टूबर 2007 में विधि स्नातक छात्रा शशि के अपहरण की शिकायत उसके पिता ने पुलिस से की थी। काफी हीलाहवाली के बाद मामला दर्ज हुआ था। शशि अपहरण व हत्या कांड में उन्हें जेल जाना पड़ा था।

भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित
आरोप: आगरा विश्वविद्यालय की एक रिसर्च स्कॉलर से बलात्कार का आरोप।
क्या थे: उस समय बुलंदशहर की डिबाई सीट से बसपा एमएलए।
अब क्या हैं: सपा से एमएलए, भाई भी सपा से विधायक।
यह था मामला: आगरा विश्वविद्यालय की रिसर्च स्कॉलर की शिकायत पर फ्रॉड, अपहरण और बलात्कार का मुकदमा। इस आरोप में उन्हें जेल जाना पड़ा था। बाद में जमानत पर छूट गए थे।

पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी
आरोप: शीलू निषाद नाम की एक महिला से सामूहिक दुराचार।
क्या थे: बांदा के हरैनी क्षेत्र से पूर्व बसपा विधायक।
अब क्या हैं: राजनीतिक परिदृश्य से गायब।
क्या था मामला: शिकायत करने की पर महिला को धमकाने और चोरी के फर्जी मुकदमे पर विधायक ने उसे जेल भिजवा दिया। अपने बचाव में विधायक ने सार्वजनिक तौर पर खुद को नपुंसक तक बताया। अंत में इस मामले में विधायक द्विवेदी को जेल जाना पड़ा।

अमर मणि त्रिपाठी
आरोप: अवैध संबंधों को जगजाहिर होने से बचाने के लिए कवयित्री मधुमिता की हत्या करा दी।
क्या थे: उस समय समाजवादी पार्टी से संस्थागत वित्त राज्यमंत्री थे।
अब क्या हैं: गोरखपुर जेल में।
यह था मामला: कवयित्री मधुमिता जब गर्भवती हो गई तो उसने शादी का दबाव डाला। अमरमणि ने उसे धमकाया पर वह नहीं मानी तो उसका कत्ल करा दिया गया। मधुमिता की हत्या के आरोप में अमरमणि के साथ उनकी पत्नी मधुमणि भी जेल में हैं।

राम मोहन गर्ग
आरोप: महिला को ब्लैकमेल कर पांच साल तक शारीरिक शोषण।
क्या थे: तत्कालीन अध्यक्ष, मत्स्य विकास निगम।
अब क्या हैं: राजीनितिक परिदृश्य से गायब।
यह था मामला: एक महिला से शारीरिक संबंध बनाकर उसकी वीडियो फिल्म तैयार की और फिर इस वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देकर लगातार पांच साल तक शोषण करते रहे। महिला ने कई बार आवाज उठाने की कोशिश की पर राजनीतिक रसूख के दम पर कोई कार्रवाई नहीं होने दी। बाद में मामले के तूल पकड़ने पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तारी की।
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योगेंद्र सागर, तत्कालीन बसपा विधायक
आरोप: दुराचार का।
क्या थे: जब आरोप लगा तब बिल्सी (बदायूं) सीट से बसपा के विधायक थे।
अब क्या हैं: राजनीतिक परिदृश्य से बाहर। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया था पर उनकी पत्नी को टिकट दिया था, जो चुनाव हार गई थीं।
क्या था मामला:  एक युवती से दुराचार के आरोपी विधायक योगेंद्र सागर के प्रभाव की वजह से ही उनके खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं किया। विधायक ने उल्टे पीड़ित युवती के भाई को ही एक अन्य आरोप में जेल भिजवा दिया। अदालत के आदेश पर मुकदमा दर्ज हुआ, लेकिन पुलिस ने इस मामले में विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी।
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