लखनऊ। लखनऊ समेत देशभर में माइक्रो, स्मॉल और मीडियम इंटरप्राइजेज (एमएसएमई) आज भी सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र बना हुआ है। कम पूंजी, जमीन की बढ़ती कीमतें और परियोजनाओं की ऊंची लागत जैसी तमाम चुनौतियों के बावजूद यह सेक्टर लखनऊ की आर्थिक रीढ़ साबित हो रहा है। वर्ष 2024-25 में लखनऊ में सबसे अधिक 62,577 सूक्ष्म कंपनियां पंजीकृत हुईं, जबकि लघु श्रेणी में 139 और मध्यम श्रेणी में केवल नौ कंपनियों की शुरुआत हुई।
कानपुर स्थित एमएसएमई कार्यालय के अनुसार, लखनऊ में वर्तमान में 2.10 लाख से अधिक कंपनियां कार्यरत हैं। इनमें से 2.07 लाख कंपनियां सूक्ष्म श्रेणी में आती हैं, जिनकी अधिकतम निवेश सीमा एक करोड़ रुपये और टर्नओवर पांच करोड़ रुपये है। लघु उद्योगों में 10 करोड़ की लागत और 50 करोड़ टर्नओवर वाली 3,020 कंपनियां कार्यरत हैं। मध्यम उद्योगों की संख्या मात्र 216 है।
विशेष बात यह है कि इनमें से अधिकतर कंपनियां सेवा क्षेत्र से जुड़ी हैं। मैन्युफैक्चरिंग के मुकाबले लखनऊ में सर्विस सेक्टर की कंपनियां तेजी से उभर रही हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य और देश के विभिन्न हिस्सों से आकर यहां बसे लोगों की जरूरतों और जीवनशैली ने सेवा आधारित उद्योगों को तेजी से पनपने का अवसर दिया है। इसका लाभ राज्य और केंद्र सरकार दोनों को राजस्व के रूप में मिल रहा है। (संवाद)
कच्चे माल व जमीन की आसमान छूती कीमतें बड़ी चुनौती
शहर के उद्यमी बताते हैं कि कच्चे माल की उपलब्धता व जमीन की आसमान छूती कीमतों की वजह से प्रोजेक्ट लागत बढ़ जा रही है। पूंजी का आधे से ज्यादा हिस्सा तो जमीन खरीदने और शेडिंग बनाने में चला जाता है। इसलिए सरकार ने इस साल से एमएसएमई के लिए प्रोजेक्ट लागत और टर्नओवर की लिमिट को बढ़ाया है। इसमें सूक्ष्म उद्यम के लिए प्रोजेक्ट लागत को एक करोड़ से बढ़ाकर 2.5 करोड़ और टर्नओवर 5 करोड़ से 10 करोड़ किया गया है। इसी तरह लघु उद्योगों के लिए प्रोजेक्ट लागत 10 करोड़ से 25 करोड़ और टर्नओवर 50 करोड़ से 100 करोड़ किया गया है। मध्यम उद्योगों के लिए निवेश सीमा 50 करोड़ से 125 करोड़ और टर्नओवर 250 करोड़ से 500 करोड़ किया गया है।
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जमीन और शेडिंग में ही आ जाता है 3 करोड़ का खर्च
इंडस्ट्री में निर्माण लागत ही 1000 रुपये प्रति फुट होती है। सबसे छोटा प्लॉट 450 वर्ग मीटर का होता है। उसका भी रेट तेजी से बढ़ता है। रिसेल ऑक्शन भी कराते हैं। सूक्ष्म उद्यम के लिए एक करोड़ से 2.5 करोड़ निवेश सीमा रखी गई है, जबकि 2-3 करोड़ तो बेसिक निर्माण में ही खर्च हो जाता है। - विकास खन्ना, आईआईए चेयरमैन
जमीन पर सब्सिडी मिले तो बढ़ेगी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जमीन की कीमत, महंगा कच्चा माल, इलेक्ट्रिसिटी और विभिन्न विभागों की एनओसी पाना सबसे बड़ी चुनौती है। इंडस्ट्री में मुश्किल से 10 फीसदी हिस्सा ही मैन्युफैक्चरिंग का है। सरकार जमीन पर सब्सिडी दे, इलेक्ट्रिसिटी व एनओसी के लिए सिंगल विंडो सिस्टम बनाए तो मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री उड़ान पकड़ेगी। - हरजिंदर सिंह, उद्यमी व चेयरमैन ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ मास्टर प्रिंटर्स (एजुकेशन एंड ट्रेंनिग) व सदस्य, भारतीय मानक ब्यूरो