लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन ने पश्चिमी हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और वहां के झीलों के खतरनाक विस्तार को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने पहाड़ी और निचले इलाकों में संभावित बाढ़ के खतरे को बढ़ा दिया है। यदि समय रहते निगरानी और रोकथाम के उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में इसका व्यापक सामाजिक और आर्थिक असर देखने को मिल सकता है। लखनऊ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के डॉ. विनीत कुमार के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में जास्कर क्षेत्र के पदम ग्लेशियर और नातियो नाला ग्लेशियर का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया।
झील का पानी तेजी से बढ़ा, खतरा भी बढ़ा
अध्ययन में सामने आया कि पदम ग्लेशियर, जो एक झील से जुड़ा है, वह तुलनात्मक रूप से ज्यादा तेजी से पिघल रहा है। वर्ष 1993 से 2022 के बीच यह ग्लेशियर काफी पीछे हट गया और आकार में छोटा भी हो गया। इसी दौरान पिघली हुई जलराशि बढ़ने से इसके सामने बनी झील का आकार करीब 69 प्रतिशत बढ़ गया। यानी ऊंचाई पर पानी का भंडार डेढ़ गुना से ज्यादा हो गया है। इतनी बड़ी मात्रा में पानी का एक जगह जमा होना अपने आप में खतरे का संकेत है, क्योंकि अगर यह अचानक टूटता है तो नीचे के इलाकों में भारी नुकसान कर सकता है।
समय रहते निगरानी जरूरी, नहीं तो बढ़ेगा खतरा
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि तेजी से बढ़ रही ऐसी झीलें अचानक बाढ़ का कारण बन सकती हैं। इससे पहाड़ों के नीचे रहने वाले लोगों, गांवों और सड़कों को बड़ा नुकसान हो सकता है। साथ ही ग्लेशियर धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हैं, उनकी चाल कम हो रही है और वे लगातार पिघलकर छोटे होते जा रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि इन ग्लेशियरों और झीलों पर लगातार नजर रखी जाए और पहले से ही चेतावनी देने की मजबूत व्यवस्था बनाई जाए।