लखनऊ। सीने में दर्द से परेशान प्रदीप गौतम बृहस्पतिवार को लोहिया संस्थान के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की ओपीडी पहुंचे। डॉक्टर ने परचे पर दो दवाएं लिखीं, जिनमें से गैस की दवा ब्राविया डीएसआर संस्थान की फार्मेसी में नहीं मिली। यह महंगी दवा बाहर एक खास मेडिकल स्टोर पर ही मिली। इसी तरह आर्थोपैडिक ओपीडी में पहुंचीं सुमन तिवारी को दवा फ्लेक्स ग्रोओ और अजय यादव को एंटीबायोटिक दवा प्रसेफ सीवी के लिए बाहर तक दौड़ लगानी पड़ी।
कमीशन के चक्कर में लोहिया संस्थान में यह खेल लंबे समय से चल रहा है। ओपीडी के डॉक्टरों की ओर से मरीजों को लिखी जाने वाली दवाओं में दो-तीन ऐसी होती हैं, जो परिसर में नहीं मिलतीं। इनके लिए मरीजों को बाहर एक खास मेडिकल स्टोर पर जाना पड़ता है। इस कारण मरीजों को मजबूरन महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। खास बात है कि मेडिकल स्टोर संचालकों व डॉक्टरों के गठजोड़ से चल रहे इस खेल पर लोहिया संस्थान के जिम्मेदार नकेल तक नहीं कस पा रहे हैं।
डिप्टी सीएम ने दी थी हिदायत
उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने बीते दिनों डॉक्टरों को ब्रांडेड व मोनोपोली दवाएं न लिखने की हिदायत दी थी। हालांकि, लोहिया के डॉक्टरों पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। वे मरीजों को अपनी मर्जी से महंगी दवाएं लिख रहे हैं।
20 गुना तक महंगी होती हैं दवाएं
डॉक्टर उन दवाओं को लिखते हैं जो बड़ी कंपनियों की दवाओं के सॉल्ट के आधार पर विशेषज्ञ तैयार कराते हैं। ये दवाएं गिने-चुने मेडिकल स्टोर पर मिलती हैं। जेनरिक की अपेक्षा ये 20 गुना तक महंगी होती है।
Iएक सॉल्ट के कई ब्रांड नाम हो सकते हैं। अस्पताल में डॉक्टर के जरिये लिखा गया ब्रांड उपलब्ध न होने पर सॉल्ट के हिसाब से दूसरे नाम की दवा दी जा सकती है। मामले की जांच कराई जाएगी। डॉक्टरों से सॉल्ट के नाम से दवा लिखवाई जाएगी।I
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- डॉ. भुवन तिवारी, प्रवक्ता, लोहिया संस्थानI