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सुलह-समझौता पैनल की नई अपील पर बिफरे पक्षकार, कहा- जिसको समझौता करना हो सुप्रीम कोर्ट में आए

Tue, 17 Sep 2019 10:58 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला अयोध्या

सार

  • पक्षकारों ने कहा, अयोध्या विवाद को लटकाने-भटकाने की हरकत अक्षम्य 
  • निर्वाणी अनी अखाड़ा के पक्षकार महंत धर्मदास ने पत्र लिखने से किया इनकार
  • कहा, जिसको समझौता करना हो सुप्रीम कोर्ट में आए, बाहर नहीं होगी पहल
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Ram Mandir Case
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की चल रही नियमित सुनवाई के बीच सुलह-समझौता पैनल की नई अपील से पक्षकारों में उबाल है। पैनल ने 155 दिन की कोशिश के बाद सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दे दी थी कि समझौता का रास्ता निकालना मुश्किल है। मगर, जब लगभग सभी पक्षों की दलीलें अंतिम दौर में हैं।
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नवंबर तक फैसला आने की उम्मीद प्रबल हो गई है तो फिर से निर्वाणी अखाड़ा व सुन्नी वक्फ बोर्ड के पत्र के आधार पर समझौता की पहल करने की अनुमति मांगने पर पक्षकारों ने मामले को जानबूझकर अटकाने व भटकाने की कोशिश करार दिया। इसे अक्षम्य व नियम विरुद्ध ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट से विचार न करने की अपील भी की गई है।

खुद निर्वाणी अनी अखाड़े के पक्षकार महंत धर्मदास ने समझौता संबंधी अपने किसी पत्र से इनकार किया है, उनका कहना है कि जिसे भी समझौता करना हो, सुप्रीम कोर्ट में आए, बाहर कोई बात नहीं हो सकती। 
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रोड़ा अटकाने वाले राममंदिर के हितैषी नहीं : नृत्यगोपाल 

महंत नृत्यगोपाल दास ने कहा कि जो लोग रोड़ा अटका रहे हैं वे राममंदिर के हितैषी नहीं हैं। वे विपरीत धारा में चल रहे हैं। मामले को अटकाने का प्रयास करने वाले राष्ट्र के शुभचिंतक नहीं हो सकते। कहा कि बाबर एक आक्रमणकारी था। आक्रमणकारी कभी देश का हितैषी नहीं हो सकता। जो रोड़ा अटका रहे हैं वह बाबर की संस्कृति के समर्थक हैं। 

दोबारा सुलह-समझौते का कोई औचित्य नहीं: दिनेंद्र दास
पक्षकार निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेंद्र दास ने कहा कि कोर्ट में चल रही नियमित सुनवाई के बीच दोबारा सुलह-समझौते की कोशिश का कोई औचित्य नहीं है। सुलह-समझौते की कोशिश कई बार असफल हो चुकी है। यह तो एक बार फिर मामले को उलझाने का प्रयास है, जिसका हम विरोध करते हैं।

कोर्ट की कार्रवाई रोककर सुलह समझौता नहीं: धर्मदास

हिंदू पक्षकार व निर्वाणी अनी अखाड़ा के महंत धर्मदास ने कहा कि सुलह-समझौता गलत नहीं होता, लेकिन कोर्ट की सुनवाई रोककर कोई बात नहीं होगी, जो भी सुलह-समझौते की बात होनी है वह कोर्ट में ही होगी। उन्होंने पैनल को समझौता के लिए कोई पत्र नहीं लिखा है। 

कोर्ट जो निर्णय देगी वह मानेंगे :  इकबाल 
मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी ने कहा कि जो सुलह-समझौते की बात सामने आ रही है उसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। कहा कि फिलहाल समझौते का अब कोई औचित्य इसलिए नहीं दिखता कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की नियमित सुनवाई चल रही है। उम्मीद है कि जल्द ही निर्णय आ जाएगा, कोर्ट जो निर्णय देगी वह मानेेंगे।

हताश-निराश लोग अटका रहे रोड़ा : त्रिलोकीनाथ 

रामलला के सखा त्रिलोकीनाथ पांडेय ने कहा कि हताश-निराश लोग मंदिर निर्माण में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हैं। चूंकि मुस्लिम पक्ष पूरी तरह से केस हार रहा है इसलिए वह पलायन की मुद्रा में है और नहीं तरकीब खोज निकाली है। बताया कि इससे कोर्ट की सुनवाई पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

राममंदिर निर्माण में बाधा डालने का प्रयास: विहिप 
विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा कि यह राममंदिर निर्माण में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास है। ऐसे लोग पिछले 70 वर्षों से मामले में रोड़ा अटका रहे हैं। अब जब उन्हें पराजय का डर सताने लगा है तो वे पलायन की नीति तैयार कर रहे हैं और बाबरी समर्थक होने का सबूत पेश कर रहे हैं।

अयोध्या पर कभी सफल नहीं हुई समझौता की कोशिशें
अयोध्या विवाद में सुलह-समझौते की कोशिशें कई बार हो चुकी हैं। पहले भी कई बार अलग लग पक्षों ने या तो मध्यस्थता की कोशिश की या फिर पेशकश की, लेकिन हर बार यह पहल किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई। राजीव, वाजपेयी, चंद्रशेखर, नरसिंह सरकार की समझौता कोशिशें भी बेअसर रहीं। संत-धर्माचार्य और मौलाना भी मिलकर इस मामले का सर्वमान्य हल नहीं निकाल सके। 134 साल पहले यह मामला न्यायालय पहुंचा था, 69 साल से मामले की सुनवाई चल रही है। 
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कब-कब हुई अयोध्या विवाद में सुलह-समझौते की कोशिश

  • साल 1986- शंकराचार्यों ने इस विवाद को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए।
  • साल 1990-91- तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार और राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की मध्यस्थता में बात कराई।
  • साल 1992- पीवी नरसिंह राव की सरकार में इस विवाद को फिर सुलह-समझौते से हल करने की कोशिश हुई। मंत्री सुबोधकांत सहाय की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई, लेकिन यह भी विफल रहा।
  • साल 2002- अटल विहारी वाजपेयी की सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में अयोध्या प्रकोष्ठ बनाया गया। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को तैनात करके कई बार सुलह का प्रयास कराया। ये प्रयास भी सफल नहीं हुए।
  • साल 2003- जून महीने में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की बात कही थी। शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने 1998 से 2004 के दौरान भारतीय जनता पार्टी की सरकार के समय मध्यस्थ की भूमिका निभाने की बात कही थी।
  • साल 2010- सितंबर महीने में हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि सुलह के लिए प्रयास करने में कोई हर्ज नहीं है। इस पर भी बातचीत का सुझाव आगे नहीं बढ़ सका।
  • साल 2010 से 2016- रिटायर्ड न्यायाधीश न्यायमूर्ति पलोक बसु इस विवाद को अदालत के बाहर मिल बैठकर सुलझाने की कई साल तक कोशिश की। इसमें हिंदू-मुस्लिमों के 10 हजार हस्ताक्षर युक्त पत्र सुप्रीम कोर्ट में पेश भी किए गए हैं।
  • साल 2016- मई महीने में ऑल इंडिया अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने अंसारी के साथ मुलाकात की। बातचीत आगे बढ़ती इसके पहले ही अंसारी का निधन हो गया।
  • साल 2017- 21 मार्च को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश की चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा है कि अगर दोनों पक्ष राजी हो तो वो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करने को तैयार हैं।
  • साल 2017-16 नवंबर को आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश की। उन्होंने कई पक्षों से मुलाकात की। हालांकि कि श्री श्री रविशंकर की पहल का कोई हल नहीं निकला था।
  • आठ मार्च 2019 को कोर्ट ने विवाद को मध्यस्थता के जरिये सुलझाने के लिए भेज दिया था। इसके लिए तीन सदस्यों का पैनल गठित किया था। जिसमें मध्यस्थता पैनल का अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश एफएमई कलीफुल्ला को बनाया गया। आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर व वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू सदस्य के तौर पर शामिल थे। शुरू में आठ सप्ताह का समय मध्यस्थता के लिए दिया गया। बाद में इसे बढ़ाकर 15 अगस्त तक किया गया। लगभग 155 दिन तक अयोध्या में चली सुनवाई में भी हल नहीं निकल सका। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पैनल को भंग कर छह अगस्त से रोज सुनवाई शुरू कर दी।
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