दरअसल, हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल कराने के प्रयास पर रोक लगा दी है। इससे पहले 5 जुलाई को अदालत ने कहा था कि सरकार जो जाति प्रमाणपत्र जारी कर रही है, वह उसके निर्णय पर निर्भर करेगा।
गोरखपुर के सामाजिक कार्यकर्ता गोरख प्रसाद की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति राजीव मिश्र की पीठ ने इस मामले में प्रदेश सरकार से तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है।
याचिकाकर्ता के वकील राकेश गुप्ता के मुताबिक, प्रदेश सरकार ने गलत व्याख्या करते हुए 24 जून को तीन अधिसूचनाएं जारी कर दीं। इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। राज्य सरकार के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
प्रदेश सरकार ने पहले 22 दिसंबर, 2016 को अधिसूचना जारी कर मल्लाह को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश दिया था। 24 जनवरी, 2017 को एक और शासनादेश जारी कर कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोड़िया, माझी और मछुआरा को पिछड़ी जाति से अनुसूचित जाति में शामिल करने का निर्णय लिया।
इसे लेकर डॉ. भीमराव आंबेडकर संगठन की ओर से जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका पर हाईकोर्ट ने कहा था कि इन जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी करने का मामला याचिका पर अंतिम निर्णय की विषयवस्तु होगा।
वर्ष 2005 में तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव ने इन 17 ओबीसी जातियों को एससी में शामिल करने का आदेश दिया था, जिस पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। 2007 में तत्कालीन सीएम मायावती ने इसकी मांग को लेकर तत्कालीन मनमोहन सरकार को पत्र लिखा था, लेकिन केंद्र ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
वर्ष 2016 में अखिलेश सरकार ने केंद्र को नोटिफिकेशन भेज अधिसूचना जारी कर दी थी, पर मामला सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में अटक गया था।