पूर्व मुख्यमंत्री मायावती कांशीराम की छाप वाली बसपा को अपने चेहरे वाली बसपा में बदलने की ओर एक-एक कदम आगे बढ़ा रही हैं। इसमें बसपा संस्थापक के खास लोगों के साथ हर उस व्यक्ति को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना शामिल है, जिसकी पब्लिक के बीच मायावती का खास और पार्टी में पावरफुल होने की धारणा बनने लगी।
पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी इसी रणनीति के अगले शिकार हैं। अपने भाई आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर मायावती ने कांशीराम की बसपा से अलहदा अपनी आगे की रणनीति का संकेत पहले ही कर दिया है।
बसपा संस्थापक कांशीराम के समय मायावती के अलावा जो चुनिंदा चेहरे पार्टी की सियासत के केंद्र में होते थे, उनमें राजबहादुर, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी, जंग बहादुर पटेल, डॉ. मसूद अहमद, सुधीर गोयल, सोनेलाल पटेल, बरखूराम वर्मा, दीनानाथ भास्कर, रामलखन पासी, दद्दू प्रसाद, कमलाकांत गौतम जैसे नाम बताए जाते हैं।
इनमें स्वामी प्रसाद मौर्य सहित चुनिंदा लोगों को छोड़ दें तो लगभग हर नेता को मायावती ने समय-समय पर बाहर का रास्ता दिखाया। मौर्य को मायावती पढ़ नहीं पाईं और उन्होंने आरोपों की सीधी बौछार कर बसपा से नाता तोड़ लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती को सिर्फ जी-हुजूरी वाले लोग ही पसंद हैं। जिसने भी नेता बनने की कोशिश की, उसे बाहर हो जाना पड़ा।