सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने मानचित्र पास करने पर लगी रोक हटा दी है।
23 जनवरी से एलडीए ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद मानचित्र पास करना बंद कर दिया था। हाईकोर्ट ने बिना किसी नीति के विकास शुल्क वसूली को अवैध करार देते हुए उस पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद शासन के आदेश पर एलडीए ने विकास शुल्क नीति तैयार होने तक मानचित्र पास करने पर रोक लगा दी थी।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी, जिस पर सुनवाई के दौरान सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।
अब पुरानी व्यवस्था के तहत एलडीए फिर विकास शुल्क लेकर मानचित्र पास करने के लिए स्वतंत्र हो गया है।
हाईकोर्ट की रोक के कारण मानचित्र पास न होने के कारण आवासीय व व्यावसायिक निर्माण नहीं हो पा रहे थे, वहीं एलडीए की आमदनी भी प्रभावित हो रही थी।
मानचित्र पास करने से मिलने वाले विकास शुल्क व अन्य शुल्क के एवज एलडीए को हर महीने 15 से 20 लाख रुपए की आमदनी होती थी।
300 वर्ग मीटर तक के मानचित्र एलडीए में स्वत: पास हो जाते हैं। यह मानचित्र टेक्निकल कमेटी केपास नहीं भेजे जाते।
काउंटर पर जमा करने के बाद मानचित्र का उसी दिन परीक्षण एलडीए जारी कर देता था।
पूर्व में बोर्ड में पास किए गए प्रस्ताव व भवन निर्माण उपविधि के तहत 300 वर्ग मीटर तक के आवासीय मानचित्र को एलडीए से पास कराना अनिवार्य नहीं है।
भवन निर्माण का मानक के तहत किया जाए और मानचित्र किसी रजिस्टर्ड आर्किटेक्ट से बनवाया जाए।
बैंक से कर्ज लेने आदि में अक्सर एलडीए से स्वीकृत मानचित्र की ही मांग होती है। इस कारण लोगों को एलडीए से मानचित्र पास कराना पड़ता है।
इसलिए लगी थी रोक
12 दिसंबर को हाईकोर्ट ने रेखा रानी के मामले में आदेश दिया था कि शहरी विकास अधिनियम में विकास शुल्क वसूलने से संबंधित कोई नियम नहीं है।
ऐसे में राज्य के प्राधिकरण विकास शुल्क समेत विकास के नाम पर अन्य तरीके से लिए जाने वाले शुल्क नहीं वसूल सकते।
हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार सर्वोच्च न्यायालय गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब पुरानी व्यवस्था के तहत फिर मानचित्र पास होने लगेंगे।
वैसे प्रदेश के कुछ प्राधिकरण सशर्त मानचित्र बिना विकास शुल्क लेकर पास कर रहे थे लेकिन एलडीए में ऐसा नहीं हो रहा था।