मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के बहाने चाचा-भतीजे फिर से एक मंच पर आ गए हैं। यह अनायास नहीं है, इसके गहरे सियासी निहितार्थ हैं। एक की विरासत पर संकट है तो दूसरे की सियासत पर। वास्तव में इस उपचुनाव में सैफई परिवार के सम्मान को आंच आती दिखी। इस आंच ने रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलाने का काम किया है। अब अहम सवाल यह है कि चाचा-भतीजे की एकजुटता सिर्फ मैनपुरी तक रहेगी या इसका असर लोकसभा चुनाव में भी दिखेगा।
सियासी अंकगणित के हिसाब से मैनपुरी में यादव के बाद दूसरे नंबर पर शाक्य मतदाता हैं। ऐेसे में अहम किरदार बने हैं शिवपाल सिंह यादव। वे प्रत्याशी घोषित होने से लेकर नामांकन तक चुप रहे। फिर अपनी विधानसभा क्षेत्र के लोगों से राय ली। इस बीच आमतौर पर उपचुनावों से दूर रहने वाले अखिलेश यादव को भी इस बात का आभास हुआ होगा कि मैनपुरी का गढ़ बचाने के लिए शिवपाल का साथ होना जरूरी है। वे पहले शिवपाल के घर गए और फिर रविवार को एक साथ मंच साझा किया, एकजुटता का संदेश दिया।
अखिलेश ने नेताजी के नाम और शिवपाल ने सैफई परिवार के सम्मान की दुहाई दी। मतदाताओं को समझाया कि उनके ही कहने पर एक हो रहे हैं। उन्होंने विधानसभा में मिलने वाले मतों का रिकार्ड तोड़ने की अपील की। ऐसे में अहम सवाल यह है कि यह एकजुटता मैनपुरी उपचुनाव के बाद भी दिखेगी अथवा नहीं।
बदल सकती है भविष्य की सियासी तस्वीर
सियासी नब्ज पर नजर रखने वालों का कहना है कि जिस तरह मैनपुरी में सैफई परिवार की एकजुटता दिख रही है उससे यह समाजवादी पार्टी के लिए टर्निंग प्वाइंट भी हो सकता है। क्योंकि एक तरफ भतीजे ने समझदारी दिखाई है तो दूसरी तरफ चाचा ने भी धीरज रखा है। देर से ही सही लेकिन अखिलेश यादव एवं डिंपल ने खुद शिवपाल के घर जाकर समर्थन मांगा। शिवपाल ने निरंतर अपमान का घूंट पीने के बाद भी सैफई परिवार के लिए फिर से कुर्बानी देने का एलान किया।
ऐसे में सहानुभूति की लहर तेज हुई है। प्रदेश की सियासत पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार नागेंद्र कहते हैं कि समाजवादियों के लिए यह उपचुनाव इसलिए भी अहम है क्योंकि अब मुलायम सिंह नहीं हैं। एकजुटता दोनों के लिए जरूरी है। मैनपुरी की तरह भविष्य के चुनाव में भी चाचा-भतीजे को समझदारी दिखानी होगी। अहम किनारे रखकर नए सिरे से सियासी पारी शुरू करनी होगी।
...आखिर शिवपाल क्यों हैं जरूरी
मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव में सियासी अंकगणित के लिहाज से जसवंत नगर विधानसभा अहम है। यहां से सीधे सपा के खाते में एकमुश्त वोट जाता है। पिछले चुनाव का इतिहास यही रहा है। लोधी और शाक्य बहुल भोगांव में हमेशा कमल का बोलबाला रहा है। लेकिन जसवंत नगर के मतों की गिनती शुरू होते ही सपा आगे निकलती रही है। 2014 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव को 5.95 लाख वोट मिले थे।
यहां से बसपा प्रत्याशी संघमित्रा मौर्य को 1.42 लाख और भाजपा के शत्रुघन सिंह 2.31 लाख वोट मिला था। लेकिन 2014 के उपचुनाव में सपा प्रत्याशी तेज प्रताप बने तो वोट का आंकड़ा 6.53 लाख पर पहुंचा। भाजपा के प्रेम सिंह शाक्य को 3.32 लाख मिला। इसी तरह 2019 में सपा का वोटबैंक करीब 10 फीसदी गिरा और 5.24 लाख वोट मिले। भाजपा के प्रेम सिंह शाक्य को 4.30 लाख वोट मिले।