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लखनऊ की बेटी ने अमेरिका में बसाया हिंदुस्तान, बोलीं- मैं देश में नहीं, देश मुझमें रहता है...

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 19 Jul 2019 04:46 PM IST
मंजू मिश्रा - फोटो : amar ujala
ये बात 2001 की है जब लखनऊ निवासी मंजू मिश्रा शादी के बाद अमेरिका चली गईं। हिंदी साहित्य से लगाव बचपन से ही था। विदेश में माहौल बिल्कुल अलग था। शुरुआत में तो वहां मन ही नहीं लगा। फिर उन्होंने परदेस में ही भारत की तलाश शुरू की। सोचा, क्यों न यहीं एक छोटा सा भारत बनाया जाए। उनकी इस मंशा में काम आई हिंदी। शुरुआत की प्रवासियों से जो भारत से आकर वहां बसे थे। उन प्रवासियों की नई पीढ़ी हिंदी और हिंदुस्तान की संस्कृति से दूर थी तो उन्होंने ठाना कि उन्हें हिंदी सिखाएंगी। बस यहीं ये हुई शुरुआत परदेस में छोटा सा भारत बसाने की।

चार हजार से ज्यादा लोगों को सिखाई हिंदी
मंजू मिश्रा बताती हैं कि कैलिफोर्निया में उन्होंने प्रवासी भारतीयों को हिंदी सिखाने की शुरुआत की। पहले बच्चे और फिर बड़े भी उनकी कक्षाओं में आने लगे। हिंदी के साथ भारतीय परंपराएं और संस्कृति के बारे में भी वे उन्हें बताती थीं। संख्या बढ़ती गई और फिर ऐसा भी समय आया कि जब उनसे हिंदी सीखने अमेरिकन भी आने लगे। बताती हैं कि वे अब तक चार हजार से ज्यादा लोगों को हिंदी सिखा चुकी हैं।

2011 में की विश्व हिंदी ज्योति की स्थापना
अमेरिका में कवयित्री के तौर पर अपनी पहचान बना चुकीं मंजू मिश्रा भारत में होने वाले काव्य समारोहों व साहित्यिक आयोजनों में भी शिरकत करती रहती हैं। वर्ष 2011 में अमेरिका में हिंदी प्रेमियों के साथ मिलकर विश्व हिंदी ज्योति संस्था की नींव रखी। इसके तत्वावधान में हिंदी सिखाने के अलावा हिंदी साहित्य व भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। हर वर्ष एक अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाता है, जिसमें अशोक चक्रधर, गजेंद्र सोलंकी, सर्वेश अस्थाना, आलोक श्रीवास्तव, स्व. प्रदीप चौबे, सुनील जोगी, सरिता शर्मा, सुरेंद्र दुबे और शबीना अदीब जैसे कवि-कवयित्री शामिल हो चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर की गोष्ठियों का भी आयोजन होता रहता है।
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काव्य संग्रह का प्रकाशन

मंजू मिश्रा की कविताओं का संग्रह 2012 में ‘जिंदगी यूं तो...’ नाम से प्रकाशित हो चुका है, जिसे अमेरिका के साथ ही भारत में भी सराहना मिली।

उत्तर प्रदेश मंडल ऑफ अमेरिका की स्थापना
2015 में उत्तर प्रदेश मंडल ऑफ अमेरिका (उपमा) नाम की नॉन प्रॉफिटेबिल संस्था के बोर्ड मेंबर के रूप में शुरुआत की। मंजू मिश्रा बताती हैं कि इसके माध्यम से भारत में चित्रकूट के पास आदिवासी गांवों में बच्चों के लिए िबेसिक शिक्षा की शुरुआत की और पांच सेंटर खोले। वहीं, बुंदेलखंड के निस्वारा में बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय का संचालन शुरू कराया, जहां बच्चों के रहने, खाने और शिक्षा की व्यवस्था उपमा की ओर से की जाती है।

ओसाट के जरिए स्कूलों का रेनोवेशन
मंजू मिश्रा ने बताया कि वन स्कूल एट ए टाइम (ओसाट) संस्था के साथ जुड़कर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के जीर्णोद्धार का काम कर रही हूं। अब तक 23 स्कूलों का रेनोवेशन हो चुका है।

घरेलू हिंसा की शिकार एशियाई महिलाओं की मदद
‘नारिका’ नाम की संस्था में मंजू मिश्रा बोर्ड मेंबर हैं। यह संस्था अमेरिका में रहने वाली ऐसी एशियाई देशों की महिलाओं की मदद करती है जो घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। इसके अलावा वे जल्द ही ‘साहस’ (सेफ्टी अगेंस्ट हैरिशमेंट एंड सेक्सुअल असॉट) नाम से जल्द ही एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर रही हैं।

मैं प्रवासी हूं, हां मैं प्रवासी हूं
शायद इसीलिए जानती हूं कि
मेरे देश की मिट्टी में
उगते हैं रिश्ते...
बढ़ते हैं प्यार की धूप में
जिन्हें बांधकर हम साथ ले जाते हैं
धरोहर की तरह और...
पोसते हैं उनको कलेजे से लगाकर।
मैं प्रवासी हूं, हां मैं प्रवासी हूं
शायद इसीलिए,
मैं देश में नहीं, देश मुझमें रहता है।
- मंजू मिश्रा
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