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Lucknow News : निर्माण निगम के पूर्व एमडी सीपी सिंह के कई कंपनियों में काली कमाई निवेश करने के मिले सुराग

Thu, 11 Jan 2024 09:44 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

उप्र राजकीय निर्माण निगम के पूर्व प्रबंध निदेशक सीपी सिंह के स्वामित्व वाली साफ्टवेयर कंपनी मार्कसाफ्ट और सात रीयल एस्टेट कंपनियों के दस्तावेज विजिलेंस के हाथ लगे है, जिनमे स्मारक घोटाले की काली कमाई के करोड़ों रुपए निवेश करने की आशंका जताई जा रही है। 
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सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
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उप्र राजकीय निर्माण निगम के पूर्व प्रबंध निदेशक सीपी सिंह ने आधा दर्जन से ज्यादा कंपनियों में काली कमाई को निवेश किया है। सीपी सिंह के ठिकानों पर बुधवार को विजिलेंस के छापों के दौरान इसके पुख्ता सुराग हाथ लगे है। ये कंपनियां मुंबई मे पंजीकृत होने की वजह से विजिलेंस की टीम छानबीन के लिए भेजने की तैयारी है।

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सूत्रो के मुताबिक छापे के दौरान सीपी सिंह के स्वामित्व वाली साफ्टवेयर कंपनी मार्कसाफ्ट और सात रीयल एस्टेट कंपनियों के दस्तावेज विजिलेंस के हाथ लगे है, जिनमे स्मारक घोटाले की काली कमाई के करोड़ों रुपए निवेश करने की आशंका जताई जा रही है। बता दें कि विजिलेंस की खुली जांच में सीपी सिंह की केवल 28 प्रतिशत अधिक आय की पुष्टि हुई थी, जबकि छापों में मिले दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच के बाद अधिकारी करोडों रुपए की अघोषित आय के सुबूत मिलने का दावा कर रहे है। इसके अलावा मुंबई और गुरुग्राम में कई आलीशान फ्लैट्स होने की जानकारी भी मिली है।

लाकर खोलने पहुंचे परिजन
बुधवार को छापे के दौरान सीपी सिंह के एक्सिस बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में तीन लाकर होने की जानकारी मिली थी, जिसके बाद अधिकारियों ने इसे आपरेट करने से मना किया था। बृहस्पतिवार को जब विजिलेंस की टीम इन लाकरों की पड़ताल करने पहुंची, तो वहां सीपी सिंह के परिजन पहले से मौजूद थे। यह देखकर लाकरों को सीज करा दिया गया।
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35 अफसरों के खिलाफ मिली अभियोजन स्वीकृति
स्मारक घोटाले में विजिलेंस को अब तक 35 अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिल चुकी है। इस मामले के आरोपी कई बड़े अफसरों के खिलाफ भी अभियोजन स्वीकृति मांगने की तैयारी है। हालांकि करीब दस वर्ष की जांच के बाद भी विजिलेंस के हाथ घोटाले के असली किरदारों तक नहीं पहुंच सके हैं। घोटाले के आरोपी नेता, आईएएस और पत्थरों के बड़े सप्लायरों के खिलाफ जांच केवल बयान दर्ज करने तक सीमित रह गई। केवल इंजीनियर और पट्टाधारकों को ही जेल भेजा जा सका। आईएएस अफसरों में केवल तत्कालीन खनन निदेशक रामबोध मौर्या के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गयी। पत्थरों को कटिंग के लिए राजस्थान भेजने के फर्जीवाड़े का खुलासा नहीं हो सका।

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