सड़क डिजाइन के दौरान सॉफ्टवेयर में कई तकनीकी आंकड़े दिए जाते हैं। इनमें अपेक्षित यातायात, भार, विभिन्न परतों की मोटाई और परतों की सामग्री के गुण शामिल होते हैं। इसके बाद कंप्यूटर मॉडल के जरिये सड़क की संरचना पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया जाता है। यानी डिजाइन स्तर पर यह सवाल पहले ही पूछा जाता है कि इतने भारी वाहनों के इतने वर्षों तक गुजरने पर परतें निर्धारित सीमा के भीतर रहेंगी या नहीं।
असली सवाल डिजाइन नहीं, निर्माण से जुड़ा
कानपुर एक्सप्रेसवे के मामले में महत्वपूर्ण पड़ताल यह होगी कि जिस डिजाइन के आधार पर सड़क को मजबूत माना गया था, क्या मौके पर उसी डिजाइन के मुताबिक निर्माण हुआ। डीपीआर और डिजाइन रिपोर्ट, आईआईटीपेव विश्लेषण, सड़क की वास्तविक परतों की मोटाई, इस्तेमाल सामग्री के परीक्षण परिणाम, मिट्टी की स्थिति, कॉम्पैक्शन रिकॉर्ड और निर्माण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षणों का मिलान किया जा सकता है। यदि डिजाइन में निर्धारित मोटाई और सामग्री के अनुरूप निर्माण हुआ है, फिर भी सड़क प्रभावित हुई है तो इसके कारणों की पड़ताल अलग स्तर पर होगी।
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे निर्माण में कथित धांधली की न्यायिक या सीबीआई से जांच कराने के आग्रह वाली जनहित याचिका सोमवार को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में दाखिल की गई है। इस पर इसी सप्ताह सुनवाई संभावित है। अधिवक्ता मोतीलाल यादव ने बताया कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से यह पी आई एल दाखिल की है। याची ने इसमें लखनऊ - कानपुर एक्सप्रेस वे निर्माण में धांधली किए जाने के आरोप लगाए हैं। याची ने याचिका के साथ एक्सप्रेस वे मामले से संबंधित छपी खबरों को भी लगाया है। साथ ही याचिका में इस एक्सप्रेस वे पर लगाए गए टोल टैक्स को काफी अधिक बताकर व्यापक जनहित में इसे अन्य एक्सप्रेस के समान उचित दर पर निर्धारित करने की भी मांग की है।