भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के जीरो टॉलरेंस नीति की अधिकारी ही धज्जी उड़ा रहे हैं। फतेहपुर के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच शुरू न होना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस मामले में मुख्यमंत्री ने 15 दिन और विभागीय मंत्री ने एक सप्ताह में जांच कर आरोपी अधिकारी के खिलाफ की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी थी। यह समय सीमा बीते 15 दिन से ज्यादा हो गए लेकिन जांच नहीं शुरू हो पाई है। यह स्थिति तब है जब शासन ने निदेशक आईसीडीएस को ही जांच अधिकारी नामित कर रखा है।
शासन स्तर से निदेशक आईसीडीएस को बार-बार रिमाइंडर भेजकर जांच रिपोर्ट देने को कहा जा रहा है, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में है। शासन के संयुक्त सचिव महाबीर प्रसाद ने 9 मई को निदेशक को रिमाइंडर भेजकर तीन दिन में जांच रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे, लेकिन निदेशालय स्तर से न तो जांच शुरू की गई है और न ही डीपीओ के खिलाफ कार्रवाई का कोई प्रस्ताव ही तैयार हो पाया है। इस मुद्दे पर शासन से लेकर निदेशालय स्तर के अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है।
ये है मामला
फतेहपुर के डीपीओ राजीव सिंह का एक कथित ऑडियो वायरल हुआ था। इसमें डीपीओ एक मुख्य सेविका से बकाये देयकों का भुगतान करने के एवज में प्रति मुख्य सेविका 20-20 हजार रुपये की मांग कर रहे हैं। वहीं, डीपीओ के चालक राम गोपाल ने भी राजीव पर निजी वाहन की मरम्मत कराके सरकारी वाहन का बिल बनवाने और एक चहेती फर्म के यहां ही वाहनों की मरम्मत कराने का आरोप लगाया था। इस बारे में भी डीपीओ और वाहन चालक के बीच हुई बातचीत का ऑडियो वायरल हुआ था।
महिला आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ ने मुख्य सचिव से और केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर ने मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्री बेबी रानी मौर्य से शिकायत कर जांच का अनुरोध किया था। इनके अलावा प्रांतीय वाहन चालक संघ ने भी डीपीओ के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने का गंभीर आरोप लगाया था। इस आधार पर मुख्यमंत्री कार्यालय से 15 अप्रैल को प्रमुख सचिव बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार को 30 अप्रैल तक जांच कर डीपीओ पर कार्रवाई के निर्देश दिए थे, लेकिन निर्धारित समय सीमा के बीते 15 दिन से अधिक हो गए पर जांच शुरू नहीं हुई है। विभागीय मंत्री बेबी रानी मौर्य ने भी 12 अप्रैल को एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे।