मंगलयान से ली गई जिस तस्वीर को देखकर हम सभी भारतवासियों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। वास्तव में उसके पीछे लखनऊ के ही होनहार कमलेश कुमार शर्मा की मेहनत और लगन है।
लखनऊ विश्वविद्यालय से एमएससी गोल्ड मेडलिस्ट कमलेश ने 5 नवंबर 2013 को जब एमओएम (मार्स ऑर्बिटर मिशन) लॉन्च करने की कमांड भेजी।
1 दिसंबर को उन्होंने ही ‘ट्रांस मार्स इंजेक्शन’ यानी मंगलयान को मंगल की कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया को शुरू की। यही नहीं, जिस दिन मंगलयान मंगल की कक्षा में दाखिल हुआ, उस दिन भी वे अपनी टीम में प्राइम कंट्रोलर की भूमिका में थे।
इतना ही नहीं, मंगलयान के मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचने की खबर भी देश को सबसे पहले देने वालों में कमलेश शामिल रहे।
परिवार मना रहा जश्न
कमलेश का लखनऊ में रह रहा परिवार उन्हें मिली इन उपलब्धियों का जश्न मना रहा है। कमलेश की बात छिड़ते उनके चाचा पुनीत एक सांस में सब कुछ गिना जाते हैं। बचपन से लेकर संघर्ष तक की सारी कहानी।
कहते हैं, गाजीपुर जिले के रेवतीपुर गांव में ही हम पले बढ़े। कमलेश ने इसी गांव से कक्षा 8 तक पढ़ाई की।
लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें करीब 16 किमी. दूर गाजीपुर के आदर्श इंटर कॉलेज जाना पड़ता था। बड़े शहरों के लिए यह दूरी सामान्य हो सकती है, लेकिन रोजाना स्कूल जाने के लिए 32 किमी. का यह सफर कमलेश के लिए खासा संघर्षों भरा रहा।
और आ गए लखनऊ
विज्ञान से कक्षा 12 पास करने के बाद कमलेश अपने माता-पिता श्रीकांति देवी और वेदप्रकाश शर्मा से दूर होकर लखनऊ आ गए।
यहां उन्हें दादी शैल शर्मा, चाचा डॉ. संतोष, मनोज और पुनीत का साथ मिला। परिवार के लोग बताते हैं कि यहां साथ रहते हुए कमलेश ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और गणित में पोस्ट ग्रेजुएशन किया।
उन्होंने गोल्ड मेडल के साथ ही कुल 10 मेडल जीते। वहीं परिवार की ओर से चलाई जा रही कोचिंग में वे पढ़ते थे और ग्रेजुएट होने के बाद उसमें पढ़ाने भी लगे।
इसी बीच डॉ. संतोष शर्मा आईआईटी रुड़की में पीएचडी के लिए चुने जा चुके थे। कमलेश ने भी दिसंबर 2008 में नेट क्लीयर करके आईआईटी रुड़की में पीएचडी शुरू की।
अप्रैल 2010 में उन्हें इसरो ने बुलावा आया और वे वहां बतौर साइंटिस्ट काम करने लगे। पुनीत बताना नहीं भूलते कि उम्र में बहुत अंतर नहीं होने की वजह से वे और कमलेश साथ पढ़ते थे। पुनीत भी आईआईटी में पढ़ चुके हैं।
याद रहेगा पीएम का वह तोहफा
चाचा पुनीत शर्मा बताते हैं कि कैसे मिशन की सफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कमलेश की टीम को बधाई दी।
बेंगलूरू के इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (इसट्राक) में कमलेश को उन्होंने एक पेपर पर पीएम ने हस्ताक्षर के साथ ‘वंदेमातरम’ लिखकर दिए।
वह कहना नहीं भूलते कि चार दिन बिना आराम किए जुटे रहे मॉम की सफलता में देश की युवा प्रतिभाओं ने कैसा योगदान दिया, वह इससे समझा जा सकता है।
कमलेश ने अपने परिवार को बताया कि मंगल की 24 सितंबर से सप्ताह भर पहले से वे अपने घर जाने का भी समय नहीं पा रहे थे। लेकिन यह सारी थकान मिशन के सफल होने और फिर पीएम से मिलने के बाद दूर हो गई।