31 दिसंबर और एक जनवरी को ऐसे ही दो मामले सामने आए। इसके बाद विभागाध्यक्ष डॉ. तूलिका चंद्रा ने पूरे मामले की जानकारी चीफ प्रॉक्टर प्रो. आरएएस कुशवाहा को दी। उन्होंने चौक कोतवाली प्रभारी को तहरीर दी।
इसके बाद पुलिस ने एक अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। चौक पुलिस का कहना है कि केजीएमयू प्रशासन की ओर से दिए गए नंबरों की पड़ताल की जा रही है। इनकी लोकेशन भी निकलवाई जाएगी। नंबरों के आधार पर यह देखा जाएगा कि सूची में दिए गए नाम सही है या नहीं।
गिरोह के लोगों के मोबाइल में रेजीडेंटों के हस्ताक्षर हैं। वे फॉर्म पर मरीज को जिस विभाग में भर्ती दिखाते हैं, उसके रेजीडेंट का हस्ताक्षर भी बनाते हैं। एक श्ाातिर इस काम में एक्सपर्ट है। इस कारण मामला पकड़ में नहीं आता।
सूत्रों का कहना है कि कुछ प्रोफेसरों और रेजीडेंटों के हस्ताक्षर से मरीज की हालत गंभीर बताकर मुफ्त में खून निकलवाने में कामयाब हो जाते हैं। कुछ मामलों में वे पेशेवर रक्तदाता को खड़ा करते हैं। नाम किसी का भरने के बाद उससे डोनेशन कराते हैं। फिर दूसरे ग्रुप का खून लेकर संबंधित तीमारदार को दे देते हैं।
केजीएमयू में खून की दलाली लंबे समय से चल रही थी। यहां कई बार पेशेवर रक्तदाता पकड़े जा चुके हैं। ऐसी स्थिति में यहां बायोमीट्रिक लगवाई गई, जिसमें अंगूठे का निशान लेने के साथ ही आंखों की मैचिंग भी कराई जाती है, लेकिन यह गिरोह उसे भी धता बताने में कामयाब रहा।
सुरक्षा इंतजाम के बावजूद गिरोह की है पैठ
केजीएमयू में चलने वाले इस गिरोह में यहां के कर्मचारियों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता है। ब्लड बैंक में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। गार्ड भी तैनात है। इसके बाद भी यहां गिरोह के सदस्य आए दिन पहुंच रहे थे। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वे बार-बार ब्लड बैंक में पहुंच रहे थे तो भी उन्हें आने की छूट कैसे दे दी गई।
कर्मचारी दोषी मिला तो होगी कार्रवाई
केजीएमयू प्रशासन इस मामले को लेकर बेहद गंभीर है। एफआईआर कराई गई है। विभाग अपने स्तर पर निगरानी कर रहा है। किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। प्रकरण में केजीएमयू का कोई भी कर्मचारी संलिप्त पाया गया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। - प्रो. आरएएस कुशवाहा, चीफ प्राॅक्टर, केजीएमयू