पहले चरण में सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, नगीना, मुरादाबाद, रामपुर और पीलीभीत में 19 अप्रैल को मतदान हुआ। वर्ष 2009 में इन सीटों पर कुल औसत मतदान 56.79 प्रतिशत रहा था। तब सत्ताधारी कांग्रेस को 1, सपा व बसपा को 2-2 और रालोद-भाजपा गठबंधन को तीन सीटें मिली थीं।
2014 में वोटिंग में करीब 10 प्रतिशत का उछाल आया। इसका फायदा भाजपा को मिला और वह सभी 8 सीटें जीत गई। 2019 में वोटिंग में 0.15 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई। सपा-बसपा गठबंधन ने 5 सीटें जीत लीं और सत्ताधारी भाजपा 3 सीटों पर ही सिमट गई।
टूटती रही है आम धारणा
चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि मत प्रतिशत कम होने का अर्थ आम तौर पर यह माना जाता है कि मतदाताओं में सत्ता विरोधी रुझान नहीं है और वे यथास्थिति के पक्ष में हैं। पर, साल दर साल के चुनावी आंकड़ों के समग्र विश्लेषण से यह निष्कर्ष सही साबित नहीं होता। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में यूपी के कुल मतदान में 5 प्रतिशत की कमी आई थी। तब राज्य में कुल 48 प्रतिशत वोट ही पड़े थे। इसका नुकसान भाजपा को हुआ। भाजपा 29 सीटों से 10 पर पहुंच गई। वहीं, 2009 में मत प्रतिशत में गिरावट का फायदा सत्ताधारी कांग्रेस को मिला। कांग्रेस 9 सीटों से 21 पर पहुंच गई।
- सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, आमतौर पर जब मत प्रतिशत घटता या बढ़ता है, तो लोग उसके निहितार्थ निकालते हैं। लेकिन, इसे लेकर किसी तरह की सहमति नहीं बन पाई है। हां, इतना जरूर कहा जा सकता है कि जब भी मत प्रतिशत के औसत आंकड़ों में 7 प्रतिशत या उससे अधिक का बदलाव होता है, तो नतीजे चौंकाने वाले होते हैं।
आम तौर पर जब मतदाता बदलाव चाहता है, तो जमकर मतदान करता है। कम मतदान का मतलब है, यथास्थिति का बरकरार रहना। हालांकि, कम मतदान होने से भी बदलाव के उदाहरण हैं।
-प्रो. संजय गुप्ता, लविवि
अगर सत्ता पक्ष से नाराज मतदाता ज्यादा निकला, तो विपक्षी पार्टियों को फायदा होता है। आम मतदाता चुनाव के प्रति उदासीन रहा, तो इसका फायदा सत्ताधारी दल को मिलता रहा है।
-प्रो. आनंद कुमार, सेवानिवृत्त शिक्षक, जेएनयू