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भाजपाई रणनीति अपना सपा ने हासिल की फतह

Wed, 17 Sep 2014 01:21 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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लव जेहाद का मुद्दा फुस्स हो गया। न कांठ का मुद्दा चल पाया और न जोधा-अकबर को लेकर बयानों का असर दिखा। पश्चिम में मुजफ्फरनगर के चलते बनी सांप्रदायिक तनाव की स्थिति को लोकसभा चुनाव में भाजपा का परचम फहराने का निष्कर्ष निकालने वाले समीक्षकों के अनुमान भी गलत निकले। लव जेहाद मुद्दे की 20 दिन में ही हवा निकल गई।
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राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि इन नतीजों में सपा की रणनीति से ज्यादा भाजपा की नाकामी का योगदान रहा है। पार्टी के नेताओं ने केंद्र में सरकार के कामकाज को आधार बनाकर लोगों में भाजपा के प्रति भरोसा पैदा करने के बजाय ‘लव जेहाद’ जैसे मुद्दों के सहारे लोगों को रिझाने का सपना संजोया।

वृंदावन में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के दौरान भाजपा ने पहले इसे बैठक में रखे जाने की बात प्रचारित कराई। मामला तूल पकड़ने लगा तो इस शब्द से तो तौबा कर लिया, पर मुद्दे से तौबा नहीं कर पाए। जनता ने भाजपा की इन कोशिशों को शायद अच्छा नहीं समझा।
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इस तरह के बयान दिए गए

ध्रुवीकरण की कोशिशें किस तरह की गईं, इसकी बानगी कुछ घटनाएं हैं। योगी आदित्यनाथ बोले, ‘दंगे वहीं ज्यादा होते हैं, जहां मुसलमान होते हैं।’ वे यहीं नहीं रुके, प्रचार के लिए बिजनौर पहुंचे तो बोले, ‘अब कोई अकबर जोधा को नहीं ले जाएगा। अब सिकंदर अपनी पुत्री चंद्रगुप्त को देगा।’

योगी से पहले बिजनौर पहुंचे आजम बोले, ‘हिंदू-मुस्लिम विवाह तो मुगलों के जमाने से होते रहे हैं। यह हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं। भाजपा प्रेमियों पर भी अपना तानाशाही वाला फैसला लादना चाहती है।’

अमित शाह बोले, ‘उत्तर प्रदेश में जिस तरह का सांप्रदायिक तनाव है और सपा जिस तरह एकतरफा कार्रवाई कर रही है, उससे भाजपा सत्ता में आई तो सपा की नीतियां ही जिम्मेदार होंगी।’

शाह के बयान से यह संदेश गया कि शायद भाजपा सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं को 2017 के लिए अवसर मान रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने भी सांप्रदायिक दंगों के सहारे ध्रुवीकरण को धार देने की कोशिश की।

मोदी की रणनीति पर भी नहीं किया गौर

लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी की रणनीति पर भी पार्टी के नेताओं ने गौर करने की जरूरत नहीं समझी। यह समझने का भी प्रयास नहीं किया कि मोदी ने पूरे चुनाव अभियान में उस मुजफ्फरनगर दंगा का जिक्र नहीं किया जिसमें भाजपा के दो विधायकों को जेल तक जाना पड़ा था।

उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर का भी कहीं जिक्र नहीं किया। मोदी का पूरा जोर इस वाक्य, ‘सबका साथ और सबका विकास’ पर रहा। लोगों को विकास का नया मॉडल दिखाते हुए उन्होंने लोगों की आकांक्षाएं जगाई।

इसके उलट यूपी के नेताओं व पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शाह तक ने यह भ्रम पाल लिया कि दंगे और मुस्लिमों को लेकर प्रदेश सरकार की नीतियों का विरोध करके वे लोगों को लुभा लेंगे।
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सपा के काम आई विकास की राजनीति

सपा ने पूरे चुनाव में इस बात की सावधानी बरती कि उसकी तरफ से कहीं ऐसा संदेश न जाए कि वह मुस्लिमों के हित में खड़ी है। जिन सीटों पर उपचुनाव हुए उन पर 2012 के चुनाव में सपा ने तीन मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे।

इस बार उसने सिर्फ एक उम्मीदवार ठाकुरद्वारा (मुरादाबाद) में ही उतारा। यही नहीं मंत्रियों के जरिये लोगों में विकास कार्यों का भरोसा भरा।

राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे जीत पाने का सपना देख रही सपा को जमीन देखनी पड़ी थी तो इस बार उसी रास्ते पर चलने का नतीजा भाजपा को भुगतना पड़ा है।
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