इसके अलावा छह सीटों पर अब तक सिर्फ एक-एक बार ही महिलाओं को लोकसभा सदस्य बनने का मौका मिला है। इस स्थिति में किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद भी नहीं है। कारण, अभी जिन 27 सीटों पर चुनाव होने हैं उनमें से सात सीटों पर प्रमुख दलों ने सिर्फ आठ महिलाओं को ही टिकट दिया है।
इनमें लालंगज से भाजपा ने नीलम सोनकर को और बसपा ने संगीता आजाद को प्रत्याशी बनाया है। नीलम मौजूदा सांसद हैं। कांग्रेस ने प्रतापगढ़ से सांसद रह चुकीं रत्ना सिंह को फिर मैदान में उतारा है। इसके अलावा शिवकन्या कुशवाहा को चंदौली, सुप्रिया श्रीनेत को महराजगंज से टिकट दिया है।
सुप्रिया अगर जीतती हैं तो वह महराजगंज से पहली और शिवकन्या जीतती हैं तो चंदौली से दूसरी महिला सांसद होंगी। चंदौली से अब तक कांग्रेेस के वरिष्ठ नेता कमलापति त्रिपाठी की बहू चंदा त्रिपाठी ही एकमात्र महिला सांसद रही हैं।
वहीं, भाजपा की डॉ. रीता बहुगणा जोशी इलाहाबाद से जीतती हैं तो दूसरी और जीतने पर केशरीदेवी पटेल फूलपुर से चौथी महिला सांसद होंगी। मेनका जीतती हैं तो वे सुल्तानपुर की पहली महिला सांसद होंगी।
कई सीटों पर अब तक जहां एक भी महिला सांसद नहीं चुनी गईं, वहीं मोहनलालगंज और रायबरेली दो ऐसी संसदीय सीटें भी हैं जिनसे आठ-आठ बार महिला सांसद चुनी गई हैं। देश में इतने बार महिला सांसदों को चुनने वाली चुनिंदा संसदीय सीटें ही होंगी।
मोहनलालगंज में पहले आम चुनाव से ही लगातार तीन बार गंगादेवी सांसद रहीं। रायबरेली से इंदिरागांधी व शीला कौल सांसद रहीं। अब सोनिया गांधी सांसद हैं। अलीगढ़ से सात बार महिला सांसद चुनी गईं हैं।
महिला आरक्षण के नारे व दावे काफी पुराने हो गए। हालांकि सियासी दल जब-तब 33 फीसदी आरक्षण देने की बात करते हैं। भाजपा ने तो संगठन के संविधान में महिलाओं की 33 प्रतिशत हिस्सेदारी देने की व्यवस्था कर रखी है। पर टिकट देने में सभी दल कंजूसी दिखा गए।
इसकी वजह कोई जिताऊ महिला उम्मीदवार न मिलना बता रहा है तो कोई समीकरणों की दुहाई दे रहे हैं। जो भी हो लेकिन इस बार भी लोकसभा की 80 सीटों में भाजपा ने गठबंधन सहित सिर्फ 11 महिलाओं को टिकट दिया है। पिछली बार गठबंधन सहित 13 महिलाओं को दिया गया था। कांग्रेस ने इस बार 12 और गठबंधन ने 10 महिलाओं को मैदान में उतारा है।
समाजशास्त्री डॉ. विनोद चंद्रा कहते हैं कि सिर्फ घोषणाओं और कानून बनाने से महिलाओं को पूरा प्रतिनिधित्व नहीं मिल जाएगा। इसके लिए महिलाओं को खुद आगे आना होगा। राजनीतिक दलों को दोष देना ठीक नहीं है। चुनाव संख्या का खेल है।
इसलिए हर राजनीतिक दल जीतने वाले उम्मीदवार पर ही दांव लगाना चाहता है। इसलिए महिलाओं को अपनी नेतृत्व क्षमता विकसित कर यह साबित करना होगा कि लोगों से संपर्क व संवाद में वह किसी से कम नहीं हैं। वे भी चुनाव जीतने की क्षमता रखती हैं।
डॉ. चंद्रा कहते हैं कि सोचने की बात यह भी है कि जिस प्रदेश में एक समय इंदिरा गांधी, सुचेता कृपलानी, मोहसिना किदवई, शीला कौल, स्वरूप कुमारी बख्शी, सरस्वती अम्माल जैसी महिला नेत्री थीं और उनका अपना-अपना प्रभाव था।
उसी प्रदेश में आज महिला नेतृत्व के नाम पर सिर्फ मायावती नजर आती हैं। पर उनकी पार्टी में भी दूसरी किसी महिला का चेहरा नेतृत्व का संदेश देता नहीं दिखता। कांग्रेस से सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी का नाम लिया जा सकता है, लेकिन इनकी सक्रियता भी अब तक यूपी में सीमित ही रही है।
पा में भी महिला नेतृत्व पर नजर डालें तो घूम-फिरकर डिंपल यादव पर निगाह टिकती है। कमोबेश यही हाल सभी दलों का है।
डुमरियागंज, बस्ती, संतकबीरनगर, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, घोसी, सलेमपुर, बलिया, जौनपुर, मछलीशहर, गाजीपुर, भदोही और सैदपुर।
प्रमुख पार्टियों ने 80 सीटों में दिए सिर्फ 32 महिलाओं को दिया टिकट
- कांग्रेस 12
- भाजपा 10 +1 (अपना दल सहित)
- सपा 6
- बसपा 4