बसपा सुप्रीमो मायावती पीएम मोदी के पिछड़े होने पर लंबे समय से सवाल उठाती रही हैं। कन्नौज से मुलायम सिंह की बहू और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल चुनाव लड़ रही हैं। मायावती इस समय मुलायम को पिछड़ों का बड़ा नेता बताने में जुटी हैं। कन्नौज और आसपास की सीटों के साथ अगले चरणों में पिछड़ों के साथ अति पिछड़े निर्णायक भूमिका में हैं। मोदी ने अति पिछड़ा कार्ड चलकर गठबंधन के साथ पिछड़ों की गोलबंदी तोड़ने की कोशिश की है।
मायावती का पलटवार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने को पिछड़े वर्ग का बताकर चुनाव में जाति के आधार पर पिछड़े वर्गों का वोट लेने का प्रयास करते हैं। ...लेकिन मोदी पहले अगड़ी जाति में आते थे। गुजरात में अपनी सरकार में पिछड़ों का हक मारने के लिए अपनी जाति को पिछड़े वर्ग में शामिल करवा लिया। मुलायम सिंह यादव व इनके बेटे अखिलेश यादव की तरह मोदी जन्मजात पिछड़े वर्ग के नहीं हैं। ..अब इनका ‘जात-पात जपना, दलितों-पिछड़ों का वोट हड़पना ’ चलने वाला नहीं है। -मायावती, 27 अप्रैल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में
प्रेस कॉन्फ्रेंस की जल्दबाजी
पीएम के वार का प्रभाव इसी से आंका जा सकता है कि चुनाव प्रचार पर मध्यप्रदेश गईं मायावती ने लौटते ही पत्रकारों को बुलाकर मोदी को ‘नकली पिछड़ा’ साबित करने की कोशिश की। इसका असर तो आगे पता चलेगा पर जात-पात के इस खेल को अब प्रत्याशियों ने भी खेलना शुरू कर दिया है। भाजपा के भदोही प्रत्याशी रमेश बिंद का ब्राह्मणों के खिलाफ बयान चर्चा का विषय बना हुआ है।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का ट्वीट
भाजपा दलितों और पिछड़ों को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहती है। भाजपा के नेताओं की भाषा इस बात को स्पष्ट कर चुकी है कि वह यह जान गए हैं कि उनकी हार तय है।
प्रदेश की प्रमुख जातियों में एससी-एसटी 22, मुस्लिम 19, ब्राह्मण 12, ठाकुर 8 प्रतिशत और पिछड़ी जातियों की तादाद करीब 54 प्रतिशत बताई जाती है। इन पिछड़ी जातियों में पिछड़े मुस्लिम भी शामिल हैं। समझना मुश्किल नहीं कि जातियों की खेमेबंदी और उसमें भी पिछड़ा वर्ग के लिए होड़ क्यों मची है? पूर्वांचल में कुर्मी, यादव, मौर्य, निषाद, राजभर, चौहान/लोनिया, कुम्हार, लोहार और लोध जैसी जातियां अलग-अलग सीटों पर अच्छा प्रभाव रखती हैं।
भाजपा की रणनीति
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पिछड़ों और अनुसूचित जातियों के साथ अगड़ों के साथ गोलबंदी कर जबर्दस्त सफलता पाई। रणनीतिकारों को एहसास हो गया है कि सपा-बसपा गठबंधन की चुनावी गणित को हिंदुओं की जातीय गोलबंदी से बिगाड़ा जा सकता है। भाजपा ने गैर यादव व गैर जाटव अर्थात सपा और बसपा के मूल वोट के अलावा अन्य पिछड़ों और अन्य दलित जातियों को जोड़ने का अभियान चलाया। जब माया व अखिलेश ने दलितों व पिछड़ों के स्वाभिमान की बात की तो पीएम ने खुद को अतिपिछड़ा बता पिछड़ी जातियों व गैर जाटव दलितों की लामबंदी की कोशिश शुरू कर दी है।
गठबंधन की रणनीति
बसपा का आधार एससी मतदाता जबकि सपा का पिछड़ा वर्ग माना जाता रहा है। भाजपा ने लगातार दो चुनावों में इनके मूल वोट बैंक में तगड़ी सेंधमारी कर दी है। विश्लेषक बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद जब विधानसभा चुनाव 2017 में भी उन्हें झटका लगा तो इन्हें अंदाजा लग गया कि वे अपना मूल वोट न बचा पाए तो पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए गठबंधन करके मैदान में उतरे।
किसी भी तरह जीत के लिए ही जाति का जाप
पूरब में बहुजनों (दलितों व पिछड़ों) की भागीदारी अधिक है, लेकिन ये संगठित नहीं हैं। लिहाजा, सभी दल टिकट देने की शुरुआत जातीय समीकरण देख कर करते हैं। सोचते हैं कि जिस समाज के प्रत्याशी को टिकट दिया है, उसका वोट पक्का हो जाएगा। इससे भी बात बनती नहीं दिखी तो बड़े-बड़े नेता जातियों को प्रभावित करने वाली बातें करने लगते हैं। मुद्दों की जगह जातियों की चर्चा कर चुनाव लड़ना अच्छा नहीं कहा जा सकता। -प्रो. चौथीराम यादव, बीएचयू
जातीय ध्रुवीकरण से बाहर आने लगे मतदाता
राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी ने कहा था कि भारतीय राजनीति की कल्पना जाति के बिना सोची ही नहीं जा सकती। हमारे राजनेता इस धारणा को पुष्ट करते नजर आ रहे हैं। वे अपने भाषण में संविधान, मुद्दे और समानता की बात कर आगे ले जाने का संकेत तो करेंगे लेकिन जात-पात की चर्चा कर पुराने बंधन से बाहर नहीं आना चाहते। हालांकि पिछले कुछ चुनावों से एक सकारात्मक संकेत सामने आया है कि मतदाता जातीय खांचे और जाति-संप्रदाय के प्रलोभन से बाहर आकर वोट करने लगा है। -प्रो. एसके द्विवेदी, राजनीतिशात्री