निकाय चुनाव में शहरी के मुकाबले नव गठित व विस्तारित निकायों में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के सामने विकास बड़ा मुद्दा बनकर उभरेगा। इस बार के निकाय चुनाव में बहुत से ऐसे निकायों में भी पहली बार चुनाव होने हैं, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं और करीब 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र ग्रामीण हैं। इसलिए इन निकायों में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव हैं। ऐसे में इन निकायों में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को विकास के मुद्दों का सामना करना होगा।
दरअसल मौजूदा सरकार ने अपने छह साल के कार्यकाल में अब तक कुल 109 नए नगर निकायों का गठन किया और 85 निकायों का सीमा विस्तार करके आसपास के ग्राम पंचायतों में निकायों में शामिल किया है। चूंकि उन कस्बों या बाजारों को ही नए निकाय का दर्जा दिया गया है, जो आबादी के मानक के मुताबिक निकाय बनने लायक नहीं थे। इसलिए सरकार ने ऐसे कस्बों और बाजारों के आसपास स्थित तमाम गांवों की आबादी को शामिल करते हुए नए निकायों के गठन का मानक पूरा कर निकायों का गठन किया था।
अब ग्रामीण आबादी वाले इन निकायों में पहली बार चुनाव होने जा रहा है। ऐसे में सभी राजीतिक दल के संभावित उम्मीदवार निकायों का हिस्सा बने गांवों के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए हैं। सभी दलों का मानना है कि गांवों में रहने वाले लोगों के लिए शहर की तरह, बिजली, पेयजल, सड़क, नाली, जलनिकासी, पार्क, मार्ग प्रकाश, कूड़ा निस्तारण जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलना एक लुभावना वादा हो सकता है, इसलिए इन मुद्दों को ही उठाकर चुनावी जंग को जीता जा सकता है।
इसके मद्देनजर सभी दल विकास के मुद्दे को ही केन्द्र में रखकर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि अभी चुनाव की अधिसूचना जारी होने में करीब एक सप्ताह से अधिक का समय लग सकता है। फिर भी चुनाव लड़ने के दावेदारों ने मतदाताओं को रिझाने के लिए अपना-अपना एडेंडा तैयार करना शुरू कर दिया है।