सुबह करीब 11 बजे से शुरू हुआ रेस्क्यू ऑपरेशन विभाग के फील्ड अफसरों की लचर प्रणाली से रेंगता ही रहा। पुलिस और वन विभाग में सामंजस्य की कमी के अलावा जुटे पसियन ढकवा, मुल्लाखेड़ा, चौरहिया, अहिरनपुरवा, नूरपरु, नुरपूर बेहटा समेत करीब दर्जन भर गांवों, कस्बों से दो हजार तमाशबीनों ने रेस्क्यू का मजाक बना दिया।
शाम 4 बजे तक महकमा सिर्फ ‘टनल पास’ के सामने पिंजड़ा ही रख सका। तब तक वन विभाग के अधिकारी, जू के जूनियर चिकित्सकों डॉ. ब्रजेश, डॉ. आशीष, डीएफओ अवध मनोज सोनकर समेत किसी भी स्टाफ ने वन्यजीव को देखा तक नहीं। तमाशबीन ग्रामीणों का हुजूम जेसीबी के आसपास मंडराता रहा, वहीं, पुलिस उन्हें पुचकारकर खदेड़ती रही। ग्रामीण भी रह-रह कर सेल्फी तो कभी बालूनुमा ढलान से फिसलने का खेल करते रहे।
शाम को लगी तेंदुए पर मुहर, 10 पटाखे दगाने पर भी हिला तक नहीं
सुबह बीमारी की हालत में रेस्क्यू ऑपरेशन में नहीं पहुंच सके जू के उपनिदेशक और रेस्क्यू विशेष डॉ. उत्कर्ष शाम करीब पौने पांच बजे पहुंचे। उन्होंने ‘टनल पास’ के भीतर झांकने के बाद पिंजड़े के मुहाने को सीधे टनल से जोड़कर 20 मिनट में जेसीबी हटवाई। तब कहीं जाकर डॉक्टरों, वन महकमे के अफसरों के साथ मीडियाकर्मियों ने भी कैमरे के फ्लैश चमका कर अंदर बैठे तेंदुए की पहली झलक देखी।
विशेषज्ञों ने पाया कि तेंदुआ टनल के दूसरे मुहाने पर 35-40 फीट पीछे दुबका बैठा है। टीम ने उसे निकालने को ब्लास्ट का सहारा लिया। 6 बजे से लेकर 45 मिनट तक टीम ने रह-रह कर 10 पटाखे दूसरे छोर से टनल में दगाए पर तेंदुए ने मूवमेंट तक नहीं की। बाद मे टनल में धुआं भरने के चलते टीम ने प्लान को ड्रॉप कर दिया।
गोसाईंगंज के मल्लूखेड़ा में सोमवार को तेंदुए को पकड़ने का सिर्फ ड्रामा चलता रहा। पुलिस और वन विभाग में तालमेल की कमी दिखी। रेस्क्यू ऑपरेशन सुबह करीब 11 बजे से शुरू हुआ। पर, शाम 4 बजे तक महकमा सिर्फ ‘टनल पास’ के सामने पिंजड़ा ही रख सका।
पसियन ढकवा, मुल्लाखेड़ा, चौरहिया, अहिरनपुरवा, नूरपरु, नुरपूर बेहटा समेत कई गांवों-कस्बों से दो हजार तमाशबीनों ने रेस्क्यू का मजाक बना दिया। शाम 4 बजे पिंजड़ा रखा जा सका। तब तक वन विभाग के अधिकारी, जू के जूनियर चिकित्सकों डॉ. ब्रजेश, डॉ. आशीष, डीएफओ अवध मनोज सोनकर समेत किसी भी स्टाफ ने वन्यजीव को देखा तक नहीं। तमाशबीन ग्रामीणों का हुजूम जेसीबी के आसपास मंडराता रहा। पुलिस उन्हें पुचकारकर खदेड़ती रही। ग्रामीण भी रह-रह कर सेल्फी तो कभी ढलान से फिसलते हुए अभियान का मजाक उड़ाते रहे।
बांस, सरिया से टनल खंगाला, पर तेंदुआ टस से मस न हुआ
गांव के करीब दर्जन भर युवकों ने जू की रेस्क्यू टीम का बखूबी साथ किया। वन विभाग के राम धीरज यादव केे साथ गांव के युवकों की टीम मिट्टी खोदाई से लेकर पिंजड़ा लगवाने में मदद करती रही। गांव के उमाकांत और देवतादीन ने बताया कि शनिवार शाम से तेंदुआ इलाके में है, क्योंकि तबसे जंगलों के बंदरों का व्यवहार बदला हुआ था। पिंजड़ा लगाने सुरंग के मुहाने से बल्ली करने के बाद जब पटाखा दगाने से भी तेंदुआ टस से मस न हुआ तो ग्रामीणों ने स्टाफ से मिलकर करीब 30 फीट लंबा बांस सुरंग के पीछे की ओर से चलाया। फिर भी तेंदुआ न हिला। सरिया से भी टनल को खंगाला गया। लेकिन सफलता हाथ न लगी सरिया छोटा पड़ गया। देर रात तक आला अधिकारी भी आपरेशन की अपडेट लेते रहे।
नवरात्र और तेंदुए का ये अजब संयोग इस बार सामने आया है। राजधानी में एक बार फिर से तेंदुए की मौजूदगी की दहशत है। स्थान लगभग वही या उससे कुछ ही दूर। साल 2016 में अप्रैल के महीने में सीजी सिटी के बबूल के जंगलों में तब गोमती किनारे शहीद पथ के पास बन रहे नये इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम के नजदीक अधरौनामऊ गांव के बबूल के जंगलों में तेंदुए का आहट हुई थी। टीम को तमाम पगमार्क मिले थे। तब इसकी सूचना पर मचे हडकंप के बाद वन विभाग के शीर्ष दो अधिकारियों ने घंटों जंगल खंगाला था। सोमवार को लगभग उसी स्थान से कुछ किमी दूरी पर तेंदुए ने ठिकाना बनाया।
देर रात करीब 10 बजे के लगभग टीम ने पास थ्रू प्लान पर काम शुरू किया। इसके तहत टीम ने सुंरग के आरपार मोटे रस्से को गुजार कर एक सिरे पर छोटी खाबड़ बांधकर अंदर कोने में दुबके बैठे तेंदुए को बाहर खींचने की कवायद शुरू की। उधर, गांव में आ पहुंचे तेंदुए को लेकर ग्रामीणों ने भी खूब चुटकी ली। किसी ने आशियाना औरंगाबाद में मारे गये तेंदुए की वकालत के लिये आये तेंदुए पर मसखरी की तो ग्रामीणों ने सरकार के एक साल के जश्न में शरीक होने के लिए आने की बात पर मजे लिए।