फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'जीत के लिए अपनाए ये हैरान कर देने वाले तरीके'

Fri, 16 May 2014 01:49 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
लोकसभा चुनाव में जीत के लिए नेताओं ने साम-दाम-दंड-भेद हर तरीके को अपनाया। यहां पढ़ें कुछ ऐसे किस्से जो आपको हैरान कर देंगे।
विज्ञापन


डेढ़ महीने लंबे चुनाव अभियान में डंके की चोट पर जो नजारे पेश हुए वे तो हर किसी को नजर आए, पर हर हाल में जीत के लिए कुछ प्रत्याशियों ने पर्दे के  पीछे साम-दाम-दंड-भेद के ऐसे-ऐसे नुस्खे अपनाए जो सामने आने से रह गए।

खास बात ये है कि ऐसे नुस्खे अपनाने में कई दिग्गज भी पीछे नहीं रहे।

अपनी सीट बचाने की खातिर उन्होंने ‘नैतिक मतदान’ के हर उसूल को चुनौती दी। हर हथकंडे अपनाए।

किस्सा एक : प्रसाद के रूप में बांटे पैसे

एक बड़ी पार्टी के प्रदेश के शीर्ष नेताओं में शामिल एक प्रत्याशी अपनी कुर्सी को खुद ही फंसी मान कर चल रहे थे। वजह, अपनी सरकार रहने के बावजूद क्षेत्र में कुछ खास नहीं करा नहीं पाए।

उन्होंने क्षेत्र के पत्रकार, प्रधान, बीडीसी, वकील और अन्य संभ्रांत लोगों के लिए खास ‘प्रसाद’ की व्यवस्था कराई। इसमें भी हिंदू-मुसलमानों की भावना खयाल रखा गया।

हिंदुओं के लिए गणेश-लक्ष्मी और बीच में स्वास्तिक की मूर्ति का बंदोबस्त हुआ तो मुसलमानों के लिए गरीब नवाज के प्रसाद के रूप में मिलने वाले वस्त्र व प्रतीक चिह्नों का।

इस प्रसाद की कीमत करीब चार-चार हजार रुपये प्रति पैकेट रही। अनुमान के अनुसार कोई 10 हजार पैकेट बांटे गए। अब सियासी प्रसाद के आशीर्वाद पर लोगों की नजरें टिकी हैं।

किस्सा दोः हुकुम का प्यार

इस चुनाव में रानी-सी पहचान वाली एक महिला प्रत्याशी भी मैदान में थीं। पति भी खासे रसूख वाले। पहले वह चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे, पर जब टिकट मिल गया तो प्रतिष्ठा लग गई। यहां भेंट-मुलाकात का दिलचस्प नुस्खा अपनाया गया।

पता चला कि मैडम के हरकारे एसयूवी से इलाके के प्रभावशाली लोगों को लाते थे। फरमान के हिसाब से साथ में बेगम को भी लाना जरूरी था।

वजह, महिलाओं से मैडम और पुरुषों से मालिक की मुलाकात का कार्यक्रम। भेंट-मुलाकात में चुनावी चर्चा तो होनी थी लेकिन चली चला की बेला में दो-दो साड़ी और एक सादे लिफाफे में प्यार भरा खुशराना अलग से।

बताया जाता है कि कोई संकोच भी करता तो इसे हुकुम का प्यार बताया जाता। ये साड़ियां भी हल्की नहीं, स्टैंडर्ड क्वालिटी की। लिफाफा भी 2000 से 5000 रुपये तक का।

किस्सा तीन: खेला मोदी विरो‌धी कार्ड

एक सीट पर एक मंत्री जी की प्रतिष्ठा फंसी है। उनके सामने एक दो मुस्लिम और भी तमाम प्रत्याशी। उनकी मुश्किल ये कि यदि मुस्लिम वोट न मिले तो जीत मुश्किल और मुस्लिम व सपा प्रत्याशी के होते उनका वोट मिलना मुश्किल।

आखिरकार जब उन्हें इस बात का अंदाजा हो गया कि मुस्लिम वोट दो मुसलमानों में बड़े मियां की ओर ज्यादा जा सकता है तो उन्होंने अंतिम चाल चली। समय भी ऐसा चुना कि मियां को सिर पीटने के सिवा कोई चारा न बचे। मतगणना के दिन निजी वाहन से चलने पर कोई रोक थी नहीं। करीब एक दर्जन निजी वाहन और गाड़ी पर बैठने के लिए दाढ़ी वाले बुजुर्ग मौलाना।

इनका बंदोबस्त एक दिन पहले शाम को ही हो गया था। सुबह चार से पांच बजे के बीच छूटे ये लोग जहां-जहां संभव था केवल यह बताते रहे कि बड़े मियां ने नरेंद्र मोदी को हराने के लिए उन्हें समर्थन कर दिया है। वे बस इत्तिला करने आए हैं।

उस गांव को छोड़ दिया गया जिसमें किसी दूसरे दल के किसी बड़े पदाधिकारी का घर हो। दस बजे तक यह मिशन पूरा हो गया। जब मियां को यह चाल पता चली तो उन्हें सिर धुनने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था। बताया जाता है कि मंत्रीजी को संतोष है कि अब वे त्रिकोण में आ सकते हैं।

किस्सा चार: बूथ का बस्ता, कास्ट की कीमत

पूर्वांचल की एक हाईप्रोफाइल सीट पर समीकरण भिड़ाने के क्या-क्या जतन हुए, जानना खासा दिलचस्प होगा। आमतौर पर हर प्रत्याशी बूथ पर चुनाव के  लिए वोटर लिस्ट, वोटर पर्ची व स्टेशनरी आदि का एक बस्ता तैयार करता है और उसकी जिम्मेदारी किसी खास कार्यकर्ता को सौंपी जाती है।

पर दिग्गज प्रत्याशी की ओर से एक नया प्रयोग किया गया। उन्होंने हर बूथ पर यादव, ब्राह्मण या ठाकुर (जहां जिसकी संख्या ज्यादा रही), हरिजन और मुस्लिम के चार-चार बस्ते तैयार कराए।

हर बस्ते में 20-20 हजार का खर्चा और हर एजेंट के लिए दो-दो हजार अलग से। पर, सावधानी ये कि बूथ के बस्ते जरूर चार-चार दिए गए लेकिन एजेंट का खर्चा केवल एक बस्ते में ही शामिल किया गया ताकि कहीं कोई गफलत न हो। सामने वाले एक-एक बस्ते से क्या कर सकते थे? वह भी केवल 10 हजार के बस्ते पर।

किस्सा पांच: एंबुलेंस का प्रयोग

पश्चिम में एक प्रत्याशी ने अपनी तैयारी काफी पहले शुरू कर दी थी। गरीब परिवारों की लड़कियों का सामूहिक विवाह भी खूब कराया।

डॉक्टर के साथ मुफ्त एंबुलेंस भी खूब चली। मुफ्त के स्वास्थ्य शिविर भी लगाए। जब यह सब वह कर रहे थे तब किसी को शायद ही अंदाजा रहा होगा कि यह फसल बोई जा रही है जिसे कुछ दिन बाद काटने की तैयारी है।

जब चुनाव आया तो वह भी एक बड़े दल का टिकट लेकर आ गए। चुनाव बीच सामूहिक विवाह और मेडिकल शिविर भले नहीं कर पाए लेकिन एंबुलेंस की जरूरत कौन रोक लेता? उन्हें उम्मीद है कि गरीबों की मदद बेकार नहीं जाएगी और उनका आशीर्वाद उन्हें संसद जरूर पहुंचा देगा।
विज्ञापन

किस्सा छह: पार्टी ने ही दिया झटका

एक पार्टी ने दो हाईप्रोफाइल सीटों पर पिछले डेढ़ साल से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों को अंतिम समय में बदल दिया। एक प्रत्याशी ने इलाके में पूजा-पाठ, हवन-पूजन, भंडारा, शादी-विवाह से लेकर कोई छोटा से छोटा मौका भी नहीं छोड़ा।

प्रसाद लेने जरूर पहुंचे और ‘व्यवहार’ भी खूब बांटा। जब मौका फसल काटने का आया तो दांव दे दिया गया। दूसरे प्रत्याशी ने अपने इलाके की गड्ढे में तब्दील हो चुकी सड़कें खूब बनवाई थी।

सरकार से पैरवी कर दूसरे काम भी खूब कराए। पर, ऐन वक्त पर उनका इलाका ही बदल दिया गया। ये दोनों प्रत्याशी अब तक ये नहीं जान सके किस वजह से उन्हें बदला गया?

बाद में तस्वीर ये बनी कि जिन्हें बाद में टिकट दिया गया वे किसी पोजीशन में आने लायक प्रयास नहीं कर पाए। अब चर्चा ये है कि ये फैसले सीटें जीतने के लिए की गई थी सियासी प्रतिद्वंद्वियों की राह आसान करने के लिए?
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें