सिर्फ सनीश ही नहीं, पावरलिफ्टिंग में ढेरों राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पद जीतने वाले शत्रुघन लाल भी एक-एक पैसे से मोहताज हैं। परिवार का पेट पालने के लिए चाट का ठेला भी लगाया। पर, धंधा मंदा होने की वजह से चार-पांच महीने में उन्हें यह काम बंद करना पड़ा। बाद में खिलाड़ियों को घर-घर जाकर पर्सनल ट्रेनिंग देनी शुरू की, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर में यह काम भी ठप हो गया। शत्रुघन बताते हैं कि पहले की तुलना में मेरे घर की माली हालत और भी खराब हो गई है, लेकिन क्या कर सकते हैं। जितनी भी जमापूंजी थी वो भी खत्म होने को है। अब बस ईश्वर से कामना है कि जल्द ही कोरोना बीमारी से आमजन को निजात मिले ताकि मेरे जैसे प्रशिक्षक भुखमरी से बच जाएं।
450 अंशकालिक प्रशिक्षक डेढ़ साल से तलाश रहे रोजगार
प्रदेश में पिछले डेढ़ साल से उनके जैसे प्रदेश के तकरीबन साढ़े चार सौ प्रशिक्षक या तो घरों पर खाली बैठे हैं या छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा कर रहे हैं। जहां तक इन प्रशिक्षकों की नियुक्ति का सवाल है तो उन्हें आउटसोर्सिंग के लिए भर्ती किया जाना है, लेकिन डेढ़ साल बीत जाने के बावजूद अभी तक इनकी सूची जारी नहीं हो पाई है।
यूपी ओलंपिक एसोसिएशन महासचिव आनंदेश्वर पांडेय का कहना है कि जिस तरह बीते दिनों खेल मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ ने पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की मदद के लिए एक कमेटी बनाई है। उसी तर्ज पर यूपी भी ओलंपिक एसोसिएशन कमेटी बनाकर जरूरतमंद खिलाड़ियों की मदद के लिए आगे आए।