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बेहाल हैं खिलाड़ी: भाड़े की कार चलाकर अपना पेट भरने को मजबूर है लक्ष्मण अवॉर्डी, लगाई मदद की गुहार

Thu, 20 May 2021 02:10 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ

सार

देश के कुछ चर्चित खेलों में तो खिलाड़ियों को खूब धन और शोहरत मिलती है पर कुछ खेल और उनसे जुड़े खिलाड़ी ऐसे भी हैं जो पाई-पाई को मोहताज हैं और किसी तरह अपना खर्च चला रहे हैं। ऐसे ही एक खिलाड़ी हैं सनीश मणि मिश्रा।
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सनीश मणि मिश्रा - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कोरोना की दूसरी लहर के दुष्प्रभाव से खिलाड़ी भी अछूते नहीं रहे। बात हो रही है, गोंडा के सनीश मणि मिश्रा की, जिन्हें वर्ष 2017 में लक्ष्मण अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। पर, आज इनकी आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो चली है। आलम यह है कि उन्हें घर चलाने के लिए भाड़े पर कार चलानी पड़ रही है। वह लंबे समय तक खेल विभाग में अंशकालिक प्रशिक्षक भी रह चुके हैं। हालांकि, बीते डेढ़ साल से सनीश को तैनाती नहीं मिली है।

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सनीश बताते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। इसलिए गोंडा में अपने गांव चला आया। काफी दिन से खाली बैठा था तो लगा शादी में गाड़ियां ही चलाकर कुछ पैसा जुटा लूं। जहां तक अंशकालिक प्रशिक्षकों की जॉब का सवाल है वह तो शासन स्तर पर ही डेढ़ साल से विचाराधीन है। सरकार में कई बार अपने और साथी प्रशिक्षकों की समस्या की गुहार लगा चुका हूं, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है। बेहतर भविष्य के इंतजार में हूं।

उधर, यूपी ओलंपिक एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर कोरोना से बिगड़े हालात में प्रवासी श्रमिकों व दिहाड़ी मजदूरों की तरह खेल प्रशिक्षकों को सरकारी मदद देने की गुहार लगाई है ताकि उनके घर का खर्चा चल सके।

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पावरलिफ्टर शत्रुघन भी पैसों के मोहताज

शत्रुघन लाल - फोटो : amar ujala
सिर्फ सनीश ही नहीं, पावरलिफ्टिंग में ढेरों राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पद जीतने वाले शत्रुघन लाल भी एक-एक पैसे से मोहताज हैं। परिवार का पेट पालने के लिए चाट का ठेला भी लगाया। पर, धंधा मंदा होने की वजह से चार-पांच महीने में उन्हें यह काम बंद करना पड़ा। बाद में खिलाड़ियों को घर-घर जाकर पर्सनल ट्रेनिंग देनी शुरू की, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर में यह काम भी ठप हो गया। शत्रुघन बताते हैं कि पहले की तुलना में मेरे घर की माली हालत और भी खराब हो गई है, लेकिन क्या कर सकते हैं। जितनी भी जमापूंजी थी वो भी खत्म होने को है। अब बस ईश्वर से कामना है कि जल्द ही कोरोना बीमारी से आमजन को निजात मिले ताकि मेरे जैसे प्रशिक्षक भुखमरी से बच जाएं। 

450 अंशकालिक प्रशिक्षक डेढ़ साल से तलाश रहे रोजगार
प्रदेश में पिछले डेढ़ साल से उनके जैसे प्रदेश के तकरीबन साढ़े चार सौ प्रशिक्षक या तो घरों पर खाली बैठे हैं या छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा कर रहे हैं। जहां तक इन प्रशिक्षकों की नियुक्ति का सवाल है तो उन्हें आउटसोर्सिंग के लिए भर्ती किया जाना है, लेकिन डेढ़ साल बीत जाने के बावजूद अभी तक इनकी सूची जारी नहीं हो पाई है।

यूपी ओलंपिक एसोसिएशन महासचिव आनंदेश्वर पांडेय का कहना है कि जिस तरह बीते दिनों खेल मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ ने पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की मदद के लिए एक कमेटी बनाई है। उसी तर्ज पर यूपी भी ओलंपिक एसोसिएशन कमेटी बनाकर जरूरतमंद खिलाड़ियों की मदद के लिए आगे आए।
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