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पढ़िए, 'आप' के विश्वास से एक्सक्लूसिव बात

Thu, 23 Jan 2014 03:39 PM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
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आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास खुद को बेहद मामूली आदमी बताते हैं। वे कहते हैं, राहुल के मुकाबले उनकी कोई औकात नहीं, लेकिन बातचीत में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ तंज कसने से बिल्कुल भी परहेज नहीं करते। वे कहते हैं, अमेठी में युवराज के साथ आम आदमी की सीधी लड़ाई है। अमेठी में भी नई दिल्ली का नतीजा दोहराया जाएगा। दिल्ली के मुकाबले अमेठी की लड़ाई को वे आसान बता रहे हैं।
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‘रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ’

मैं यह जानने के लिए अमेठी आया हूं कि कुमार विश्वास के चुनावी मैदान में कूदने के ऐलान से यहां क्या फर्क आया है। क्या कहेंगे...।

हमारे आने से लोग यह सोचने लगे हैं कि कोई ऐसी पार्टी भी है जो कम्फर्ट की पॉलिटिक्स को चुनौती दे रही है। ये जो अब तक चल रहा था कि तुम मेरे ऊपर सवाल नहीं करोगे, हम आपको नहीं छेड़ेंगे। सियासी दलों के बीच पार्लियामेंट तक में इस तरह का एक अघोषित समझौता काम कर रहा है। कहते हैं न ‘रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ’। हमने इस सिलसिले को खत्म होने को लेकर लोगों में एक उम्मीद जगाई है। अमेठी के साथ अब तक जो नाइंसाफी हुई है, उसकी समाप्ति की उम्मीद जगाई है। बाहर से आने वाले लोग यह सोचकर अमेठी आते हैं कि यहां विकास की ऐसी तस्वीर दिखेगी जैसी दूसरे वीआईपी संसदीय क्षेत्रों में दिखती है, लेकिन यहां इसके उलट है। अमेठी की गिनती देश के कुछ उपेक्षित और खराब संसदीय क्षेत्रों में होती है। लोगों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। ---सड़क के करीब रहने वाले बीमार लोगों के लिए स्वास्थ्य की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। सड़कें खराब हैं।

कांग्रेस हिमाचल में घर बनाती है, पर अमेठी में नहीं

अमेठी से आपके चुनाव लड़ने की पृष्ठभूमि और वजह क्या है...
इसकी भूमिका अमेठी से ही तैयार हुई। अन्ना के आंदोलन के वक्त जब हम लोकपाल बिल को लेकर सर्वे कर रहे थे तो अमेठी की जनता ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। यहां के करीब डेढ़ लाख लोग उस सर्वेक्षण का हिस्सा बने थे। तभी यह तय हो गया था कि आम आदमी पार्टी अमेठी की जनता को आवाज देगी और आज हम यहां हैं। यह अमेठी का दुर्भाग्य ही है कि यहां से चुनाव लड़ने वाला तो देश का प्रधानमंत्री बन जाता है। अमेठी से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचने वाले को पिछले दस साल से प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है और देश के प्रधानमंत्री उनके लिए अपनी कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार रहते हैं लेकिन अमेठी का विकास से कोई वास्ता नहीं। ये क्या अमेठी का दुर्भाग्य नहीं कि जिनके पुरखे तक यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं और खुद दस साल से इस क्षेत्र की नुमाइंदगी कर रहे हैं लेकिन यहां उनका अपना घर तक नहीं। वे गेस्ट हाउस में ठहरते हैं। वे हिमाचल की वीरभद्र सरकार से पूरा पहाड़ खरीदकर वहां तो अपना घर बनाते हैं लेकिन जहां की जनता उन्हें चुनकर लगातार संसद भेजती रही है, वहां दो सौ गज के प्लॉट पर मकान बनाने का उनका सपना नहीं।

अज्ञी तो लोगों से मिलकर उन्हें समझ रहा हूं

क्या राहुल की यही कमजोरियां कुमार विश्वास की ताकत बन जाएंगी? क्या केवल वंशवाद के खिलाफ आपका आह्वान अमेठी में आपकी जीत सुनिश्चित कर पाएगा? आप अमेठी के लोगों से क्या वादा कर रहे हैं...
अमेठी के लोग कई समस्याओं से त्रस्त हैं। अमेठी और उसके मौजूदा नेता के बीच बहुत बड़ी खाई है। दोनों के बीच एक नहीं, कई-कई दलालों ने जगह ले ली है। यहां कांग्रेसी दो-दो हजार वोटों के पॉकेट में बंटे हैं। हजार-हजार वोटों का इंतजाम करने वाले लोग सरकारी सुविधाएं हड़प ले रहे हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ इन्हीं दबंगों ने हड़प लिया है। उनके खिलाफ  लोग आवाज नहीं उठा पा रहे हैं। अमेठी अपनी इसी उपेक्षा से तिलमिलाई हुई है। मैं लोगों से मिलकर उनकी और भी समस्याएं जानने-समझने की कोशिश कर रहा हूं। अभी तक का अध्ययन बताता है कि आम आदमी के स्वराज की कल्पना ही यहां के लोगों को उनकी समस्याओं से निजात दिला पाएगी।

अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ अपनी लड़ाई को कहां पाते हैं...

अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ  अपनी लड़ाई को कहां पाते हैं...
देखिए मेरी कोई औकात नहीं है। मैं तो एक मामूली आदमी हूं। शिक्षक का बेटा हूं। कवि हूं। नौकरी छोड़कर आया हूं, लेकिन यह भी जानता हूं कि अमेठी की जनता ने राहुल गांधी को उनकी योग्यता-अयोग्यता के आधार पर नहीं चुना है। अमेठी ने राहुल को केवल स्नेह में जिताया है। उन्हें केवल इसलिए चुना है क्योंकि वे किसी खास परिवार से संबंध रखते हैं। इसके अलावा उनकी क्या योग्यता है? मैं तो फिर भी एक योग्यता के साथ उनके सामने खड़ा हूं। मैंने सड़क पर लोगों की लड़ाई लड़ी है। धरना दिया है। दामिनी और गुड़िया के लिए संघर्ष किया है। देश का कोयला चुराते हुए सोनिया गांधी के दरवाजे पर पीटा गया हूं। लाठियां खाई हैं। मैं अमेठी के लिए एक अवसर बनकर खड़ा हूं। उनकी आवाज बनने को तैयार हूं।

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मैं राजधर्म के साथ हूं

जब संसद के भीतर लोकपाल का बिल फाड़ दिया गया था तो आपने एक कविता लिखी थी जिसका भाव यह था कि राजनीति इतनी गंदी है कि आप इसमें फिट नहीं होते। अब क्या कहेंगे...
मैं उस तरह की राजनीति में आज भी नहीं हूं। मैं तो उस राजनीतिक धारा के साथ हूं जिसे राजधर्म कहा जाता है।
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