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मुख्यमंत्री अखिलेश ऊपर मेट्रो चलाते रहे नीचे से पार्टी निकल गई: कुमार विश्वास

Sat, 17 Sep 2016 12:39 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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कुमार विश्वास - फोटो : amar ujala
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आम आदमी पार्टी नेता कुमार विश्वास ने सपा की पारिवारिक कलह पर अपने अंदाज में तंज कसा। उन्होंने कहा कि यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मेट्रो के ऊपर चलते रहे लेकिन पार्टी नीचे से निकल गई।
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लखनऊ के गाडगे प्रेक्षागृह में आयोजित काव्य पाठ में कुमार विश्वास ने प्रदेश की सियासत में चल रही उठापटक पर खूब टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि कभी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चल रही थी और लग रहा था वे जीतेंगे। बड़े-बड़े हाईवे बने थे।

वे उस पर खड़े होकर फोटो खिंचवाते रहे विकास की यात्रा कहते हुए और नीचे से सरकार निकल गए। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मेट्रो के ऊपर चलते रहे और पार्टी नीचे से निकल गई। विश्वास ने मेट्रो का बार-बार जिक्र किया, कहा कि हम उस मेट्रो में फंस जाते हैं जो अभी बनी ही नहीं है।
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'दूल्हे की खाट उठाकर बराती भाग गए'

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की जनसभाओं में खाट लुट जाने पर विश्वास ने टिप्पणी की कि सामने बिछी खाटें देखकर 46 साल की उम्र में दिल में कुछ आया होगा लेकिन ये पहले दुल्हे हैं जिनकी खाट उठाकर बाराती ले गए।

अपने काव्य पाठ के दौरान हमेशा की तरह कुमार ने ज्यादातर तीर राजनेताओं पर ही चलाए। वहीं उन्होंने अपने ऊपर लगने वाले आरोपों पर भी सफाई दी।

कई रचनाओं को यह कहते हुए सुनाया कि इन्हें लखनऊ में पहली-पहली बार सुनाकर भूमि पूजन कर रहा हूं। उन्होंने कहा भी कि राजनीति में सीधे बात होती है लेकिन मैं कविता के जरिये इशारों से बात करता हूं।

गवर्नर के यहां बंधक मगर सरकार जैसे हैं...

उन्होंने सुनाया-‘अधूरी इक कहानी के किसी किरदार जैसे हैं, जहां खबरें गवाहों में हैं उस अखबार जैसे हैं, हमें दुनिया ने तो दिल के चुनावों में जिताया है, गवर्नर के यहां बंधक मगर सरकार जैसे हैं’।

अपनी सफाई में उन्होंने कहा- ‘कृपा रुतबा इनायत मेहरबानी बेअसर निकली, मुझे बदनाम करने की निशानी बेअसर निकली, मेरे हर लफ्ज का जादू जमाने की जुबां पर है, तुम्हारे साजिशों की हर कहानी बेअसर निकली’ और ‘सियासत में तेरा खोया या पाया हो नहीं सकता, तेरी शर्तों पे गायब या नुमायां हो नहीं सकता, भले साजिश से गहरे दफन मुझको कर दो पर मैं, सृजन का बीज हूं मिट्टी में जाया हो नहीं सकता’।
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इन रचनाओं पर मंत्रमुग्‍ध हुए श्रोता

कुमार विश्वास ने जब अपनी कई पुरानी लोकप्रिय रचनाएं सुनाईं तो खचाखच भरे सभागार में बहुत सारे दर्शक उन पंक्तियों को साथ-साथ गाने लगे।

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है.., कोई कब तक महज सोचे, कोई कब तक महज गाए.., मुहब्बत एक अहसासों की पागल सी कहानी है.., बदलने को तो इन आंखों के मंजर कम नहीं बदले.. पर दर्शकों ने खूब सुर मिलाए।
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