लखनऊ। गोमती की सहायक इकाई रही कुकरैल नदी वन क्षेत्र के पांच किमी इलाके में बहती है। यही इलाका इसे पुनर्जीवन दे रहा है। प्राकृतिक तरीकों से यहां 50 फीसदी तक गंदगी खत्म हो जाती है। हालांकि, यहां से निकलते ही कुकरैल में गिरने वाले सीवर इसे नाला बना देते हैं। अब नई तकनीकों से कुकरैल को स्वच्छ बनाने पर वन विभाग कर रहा है। अफसरों का कहना है कि वन क्षेत्र की तरह आगे भी दूसरे विभाग प्राकृतिक माहौल दें तो यह कुकरैल साफ हो जाएगी। फिर आगे जाकर यह गोमती को भी नई जिंदगी देगी।
वन विभाग के अफसरों ने कहा कि अयोध्या रोड पर कुकरैल नाला गंदा और बदबूदार दिखता है, लेकिन घने वन क्षेत्र से गुजरने के दौरान इसका पानी साफ हो जाता है। वन क्षेत्र में मौजूद घास, जलीय पौधे इसकी अशुद्धियां सोख लेते हैं। एक साल पहले इंदिरा नहर से जुड़ने के बाद कुकरैल में जल प्रवाह भी तेज हुआ है। हालांकि, वन क्षेत्र से निकलते ही नाले कुकरैल को फिर गंदा कर देते हैं।
डीएफ ओ अवध डॉॅ. रवि कुमार सिंह ने बताया कि बाराबंकी-सीतापुर बॉर्डर क्षेत्र से आने वाला कुकरैल नाला वन क्षेत्र में कुर्सी रोड के पास से प्रवेश करता है। यह सीमैप के पास वन क्षेत्र को छोड़कर शहरी सीमा में निकलता है। इस दौरान पांच किमी में नाला वन क्षेत्र में ही रहता है। सिंचाई विभाग से तालमेल के बाद इंदिरा नहर से लिंक कराने पर इसका जल प्रवाह बढ़ा है। सिंचाई विभाग का बैराज भी ऐसे चलता है कि पानी की भरपूर मात्रा वन क्षेत्र को मिलती रहे। अफसरों ने बताया कि घड़ियाल एवं कछुआ पुनर्वास केंद्र के पास फाइटो-रेमेडिएशन तकनीक से भी काफी हद तक पानी साफ हो जाता है।
पेड़-पौधे ही नदी को बनाएंगे साफ
डीएफओ अवध क्षेत्र डॉ. रवि कुमार सिंह का कहना है कि वन क्षेत्र में कुकरैल के पानी की 50 फीसदी अशुद्धियां खत्म हो जाती हैं। यह पानी शहरी क्षेत्र से गुजरता हुआ गोमती में मिलता है, लेकिन इस दौरान सीवर का पानी इसमें गिरता है। पेड़-पौधे ही कुकरैल को साफ करेंगे।
प्रवाह बढ़ने से गंदगी खत्म
वन एवं पर्यावरण मंत्री दारा सिंह चौहान का कहना है कि कुकरैल में पानी छोड़ने के लिए सिंचाई विभाग से बात की गई है। पानी मिले तो जहां नदी स्वच्छ होगी, वहीं जलीय जीव और वन क्षेत्र के जानवरों को भी पानी मिलेगा। नदी में प्रवाह बढ़ने से गंदगी भी खत्म हो जाएगी।
प्राकृतिक तरीकों पर ही हो काम
पर्यावरणविद् वेंकटेश दत्ता ने बताया कि कुकरैल के पुनर्जीवन के लिए कम खर्च वाले प्राकृतिक तरीकों का उपयोग करने को कहा है। कुकरैल को उसका स्वरूप लौटाने में नगर निगम, वन विभाग, सिंचाई विभाग को एक साथ आकर काम करना होगा।