ब्लड प्रेशर कम हो रहा हो, नब्ज भी धीमी हो जाए, हाथ पैर ठंडे हो जाएं, सांस लेने में दिक्कत हो, कुछ भी भोजन लेने पर उल्टी हो जाए और शरीर पर लाल चक्कतें हों तो तुरंत चिकित्सक के पास जाने की जरूरत है। ये सभी डेंगू शॉक सिंड्रोम के लक्षण हैं।
ऐसे में मरीज को अस्पताल में भर्ती कराना जरूरी है। ये लक्षण सिर्फ एक फीसदी ही मरीजों में होेते हैं। इसलिए बहुत ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है। जागरूकता से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है।
संजय गांधी पीजीआई की हीमेटोलॉजी विभाग की हेड प्रो.सोनिया नित्यानंद, शरीर प्रतिरक्षण विज्ञानी प्रो.विकास अग्रवाल, सूक्ष्मजीव विज्ञानी डॉ. रिचा मिश्रा और फिजीशियन डॉ. प्रेरणा कपूर ने शुक्रवार को ये जानकारी दी।
विशेषज्ञों ने कहा कि डेंगू बीमारी से भयभीत होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इस बीमारी से ग्रस्त मरीज की मौत का संभावना एक फीसदी से भी कम है। डेंगू से पीड़ित उन मरीजों में अधिक खतरा है जिन्हें दोबारा ये बीमारी होती है।
इन मरीजों को ही भर्ती की जरूरत होती है। या फिर ऐसे मरीज जिन्हें सात दिन से अधिक बुखार रहे, छोटे बच्चे, वृद्ध और गर्भवती इस बीमारी की गंभीरता के शिकार होते हैं। यदि ये काउंट 10 हजार से कम हो जाए या फिर नाक, मसूढ़ों, पेशाब और मलत्याग के समय रक्तस्राव होने लगे तो प्लेटलेट्स चढ़ान की जरूरत पड़ती है। रक्त की कमी से कई अंग काम करना बंद कर देते हैं।
प्रो. सोनिया नित्यानंद ने बताया कि दिल के मरीज जो रोजाना इकोस्प्रिन (खून को पतला करने की दवाएं) लेते हैं उन्हें बुखार होने पर सावधानी बरतने की जरूरत है। यदि उन्हें डेंगू हो जाता है तो इकोस्प्रिन बंद कर सिर्फ पैरासिटॉमल ही खानी चाहिए। खून की पतला करने की दवाएं लेने से उन्हें रक्तस्राव की समस्या हो सकती है
शरीर प्रतिरक्षा विज्ञानी प्रो.विकास अग्रवाल के अनुसार डेंगू के मरीजों में मौत तभी होगी जब उसे द्वितीयक (सेकेंडरी) संक्रमण हो। आमतौर पर डेंगू बुखार 0 से 5 दिन तक रहता है। यदि इसके बाद बुखार ठीक हो जाए तो मरीज को कोई दिक्कत नहीं होगी।