हिस्टामीन स्रावित होने से श्वास नलिकाएं संकुचित हो जाती हैं
धूल (घर या बाहर की) या पेपर की डस्ट, रसोई का धुंआ, नमी, सीलन, मौसम परिवर्तन, सर्दी-जुकाम, धूम्रपान, फास्टफूड, मानसिक चिंता, व्यायाम, पालतू जानवर एवं पेड़ पौधों एवं फूलों के परागकण तथा वायरस एवं बैक्टीरिया के संक्रमण आदि प्रमुख होते हैं। जब अस्थमा के कारक मरीज के संपर्क में आते है तो शरीर में मौजूद विभिन्न रसायनिक पदार्थ (जैसे हिस्टामीन) स्रावित होते हैं। इनसे श्वास नलिकाएं संकुचित हो जाती हैं। श्वास नलिकाओं की भीतरी दीवार में लाली और सूजन आ जाती है और उसमें बलगम बनने लगता है। इन सभी से दमा के लक्षण पैदा होते है तथा बार-बार कारकों के संपर्क में आने से श्वास की नलिकाओं में स्थायी रूप से बदलाव हो जाते हैं।
दो तिहाई में बचपन से शुरू होती है बीमारी
दो तिहाई से अधिक लोगों में दमा बचपन से ही शुरू हो जाता है। इसमें बच्चों को खांसी होना, सांस फूलना, सीने में भारीपन, छींक आना व नाक बहना तथा बच्चे का सही विकास न हो पाना जैसे लक्षण होते हैं। शेष एक तिहाई लोगों में दमा के लक्षण युवा अवस्था में प्रारंभ होते हैं। इस तरह दमा बच्चों या युवावस्था में ही प्रारंभ होने वाला रोग है।
इन्हेलर है सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा
दमा के इलाज में इन्हेलर चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ है क्योकि इसमें दवा की मात्रा का कम इस्तेमाल होता है। इस तरह से दवाई दुष्प्रभाव कम से कम होता है। इसका असर सीधा सांस नलियों और फेफड़े पर होता है। इसलिए अस्थमा में इन्हेलर चिकित्सा की सलाह दी जाती है।
अस्थमा के लक्षण-
खांसी- जो रात में और गंभीर हो जाती है, सांस लेने में कठिनाई जोकि दौरों के रूप में तकलीफ देती हो, छाती में कसाव या जकड़न, छाती में से घरघटाहट जैसी आवाज आना, गले से सीटी जैसी आवाज आना।
अस्थमा का उपचार-
दमा के इलाज के लिए दो तरह की दवाइयां होती है। वायुमार्ग खोलने के लिए वायुमार्ग की सूजन कम करने के लिए। इलाज के लिए दो प्रमुख तरीके के इन्हेलर है। 1. रिलीवर इन्हेलर- जो जल्दी से काम करके श्वांस की नलिकाओं की मांसपेशियों का तनाव ढीला करते है और तुरन्त असर करते है। इनको सांस फूलने पर लेना होता है।
कंट्रोलर इन्हेलर श्वास नलियों में उत्तेजना और सूजन घटाकर उनको अधिक संवेदनशील बनने से रोकते हैं। इससे गंभीर दौरे का खतरा कम हो जाता है। लक्षण न होने पर भी लगातार लेना चाहिए। दमा के अन्य नये उपचार जैसे कि बायोजीकल्स का इस्तेमाल भी किया जाता है।
दमा के दौरे को रोकने के लिए उपाय-
मौसम में घटते-बढ़ते तापमान में अपना ध्यान रखें। दमें की दवा हमेशा अपने पास रखें और कंट्रोलर इन्हेलर हमेशा समय से लें। सिगरेट/सिगार व बीड़ी के धुएं से बचें। अपने फेफड़े को मजबूत बनाने के लिए सांस का व्यायाम अर्थात प्राणायाम करें। यदि बलगम गाढ़ा हो गया है, खांसी, घरघराहट और सांस लेने में तकलीफ बढ़ जाये या रिलीवर इन्हेलर की जरूरत बढ़ गई हो तो तुरन्त अपने चिकित्सक से मिलें।
दमा के रोगी ये न करें-
- धूल-गंदगी से बचें।
- बच्चों को लंबे रोएंदार कपड़े न पहनाएं रोएंदार खिलौने खेलने को न दें।
- पंख या रेशम के तकिये का इस्तेमाल न करें।
- सेमल की रूई से भरे तकिए, गद्दा या रजाई का इस्तेमाल न करें।
- घर के अंदर फूलों वाले पौधे या ताजे फूल न रखें।
- सिगरेट/बीड़ी न पिएं, रोगी के घर में किसी अन्य को भी सिगरेट/बीड़ी न पीनें दें।
- रोगी एयरकंडीशन या कूलर के कमरे से एकदम गर्म हवा में बाहर न जाएं।
- यात्रा के दौरान बच्चों को लेकर वाहन की खिड़की के पास न बैठें।
- बिना डाक्टर की सलाह के कोई दवा लंबे समय तक न खाएं।
- धुआं, धूल, मिट्टी, वाली जगह से बिना नाक मुंह ढंके न गुजरें।
- इत्र, परफ्यूम या डीओडेरेंट का इस्तेमाल न करें।
- घर में जानवर न पालें।
- मच्छरों को भागाने वाली कॉइल या अगरबत्ती के साथ ही साधारण अगरबत्ती/धूपबत्ती का भी इस्तेमाल न करें।
- घर की सफाई, पुताई व पेंट के समय रोगी घर में न रुकें।
लेखक-
डॉ. सूर्यकांत- प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, इंडियन कॉलेज ऑफ एलर्जी अस्थमा एंड एप्लाइड इम्यूनोलॉजी