पूरी दुनिया जिस शायर की जादूगरी पर फिदा रहती थी, वो शख्स लखनऊ पर फिदा था। जब भी लखनऊ से राहत साहब को बुलावा जाता तो वे खुशी-खुशी चले आते थे। लखनऊ में अपने चाहने वालों के बुलावे पर आखिरी बार राहत साहब ने 15 नवंबर को एक मुशायरे में शिरकत की थी।
इस मुशायरे के केंद्र में वही थे। उनके साथ मौजूद लोगों को क्या पता था कि लखनऊ में उनका ये आखिरी मुशायरा होगा। उनसे जुड़े लखनऊ के शायरों और अजीजों ने जब उनके इंतकाल की खबर सुनी तो अवाक रह गए। उनके साथ बिताए पलों और उनके साथ ली गई तस्वीरों को सोशल मीडिया पर साझा भी किया। हर तस्वीर में उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा, मानों अपने चाहने वालों से खुद अपना ही शेर दोहराकर सांत्वना दे रहा हो कि-
‘ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था
मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था।’
जब राहत बोले, ये दौर अब आप लोगों का है...
लखनऊ में अपने आखिरी मुशायरे के दौरान राहत इंदौरी
- फोटो : amar ujala
शायर शाहबाज तालिब ने बताया कि 15 नवंबर को मीर तकी मीर फाउंडेशन की ओर से जयपुरिया स्कूल गोमतीनगर में जश्न-ए-गजल कार्यक्रम के आयोजन में जब मैंने और हर्षित मिश्रा ने उनसे कहा कि अगला आयोजन जश्न-ए-राहत इंदौरी नाम से होगा। तो वे बोले कि अब आगे का दौर आप लोगों का है।
तब हमें क्या मालूम था कि वो शायद यह कहना चाह रहे थे कि जिंदगी का क्या भरोसा मगर हम ही नहीं समझ सके। शायर हर्षित मिश्रा ने कहा कि राहत साहब का जाना हम सबके लिए बड़ा नुकसान है। इतने बड़े कद के शायर होने के बावजूद भी वे हमेशा हम छोटों से ऐसे मिलते थे कि जैसे हमारी ही उम्र के हों।
खुशनसीब हूं कि उनके हाथों मिला पुरस्कार
मशहूर शायर सलीम सिद्दीकी ने कहा कि मैं खुशनसीब हूं कि पिछले साल नवंबर में मीर तकी मीर फाउंडेशन की ओर से आयोजित मुशायरे में मुझे 51 हजार रुपये का पुरस्कार राहत साहब के हाथों मिला। बोले, राहत साहब के जाने से मन बहुत भारी है। वे जब भी लखनऊ आते थे तो नए शायरों के बारे में अक्सर पूछा करते थे। इतनी बड़ी शख्सियत होने के बावजूद वे लोगों को नाम से पुकारते और पहचानते थे।
पूरी दुनिया में ऐसा स्टारडम किसी शायर को नहीं मिला
मनीष शुक्ला
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मशहूर शायर और राहत इंदौरी के साथ अनगिनत मुशायरों में शिरकत कर चुके मनीष शुक्ला कहते हैं कि पूरी दुनिया में राहत जैसा स्टारडम किसी शायर को मंच पर नहीं मिला। न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि पाकिस्तान, दुबई समेत पूरे विश्व में राहत के चाहने वाले थे। उनकी आंखों के इशारों, हाव-भाव और अंदाज पर शायरी के शौकीनों की तालियां गूंजतीं थीं। मेरी उनसे दो माह पहले ही बात हुई थी जब उन्होंने अपने यू-ट्यूब चैनल के लिए मेरी गजलें मांगी थीं। उनका जाना शायरी जगत के लिए बड़ा नुकसान है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
दोपहर दो बजे बात हुई और शाम को मिली मनहूस खबर
राहत साहब के बेहद करीबी रहे शायर मेराज हैदर ने बताया कि मंगलवार को दोपहर दो बजे के करीब मेरी राहत साहब से बात हुई तो उन्होंने कहा कि मैं जल्द ही ठीक हो जाऊंगा। शाम को जब मनहूस खबर मिली तो मुझे यकीन नहीं हुआ। मैंने उनके बेटे सतलज को फोन मिलाया तो बिजी जा रहा था। थोड़ी देर बाद फोन आया तो उसने बताया कि उनका इंतकाल हो गया है। मेराज ने बताया कि राहत साहब के साथ मैंने कुवैत, दुबई समेत बहुत सारे मुशायरों में शिरकत कीं। बोले, मेरे लिए यह व्यक्तिगत क्षति है।
इसी साल फरवरी में एक निजी कार्यक्रम में आए थे
मेराज हैदर ने बताया कि वे एक निजी कार्यक्रम में शामिल होने इसी साल फरवरी में लखनऊ आए थे तो मुझे फोन कर होटल बुलाया। उस दिन काफी तेज बारिश हो रही थी। मेरी उनसे वो आखिरी मुलाकात थी।
1988 में शिया कॉलेज में बुलाया था
शायर अमित हर्ष
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शायर अमित हर्ष कहते हैं कि उन्होंने राहत इंदौरी को वर्ष 1988 में पहली बार शिया कॉलेज में एक मुशायरे में बुलाया था, वहीं पहली बार उनसे मुलाकात हुई। बोले, राहत साहब मुशायरों की कामयाबी की गारंटी हुआ करते थे, उनका जाना बहुत बड़ा नुकसान है। राहत साहब जब भी लखनऊ आते तो उनका पसंदीदा ठिकाना गुलमर्ग होटल था। वे वहीं ठहरना पसंद करते थे। उनका कहना था कि यहां आकर मैं लखनऊ में अपने सभी दोस्तों और चाहने वालों से दिल खोलकर मिल पाता हूं।
अनवर जलालपुरी की प्रेरणा से राहत बने डॉ. राहत इंदौरी
उर्दू में गीता लिख कर इतिहास में नाम दर्ज कराने वाले शायर स्व. अनवर जलालपुरी के बेटे और लविवि के उर्दू विभाग में प्रवक्ता डॉ. जनिसार आलम राहत इंदौरी को याद करते हुए कहते हैं कि मेरे वालिद की किताब ‘खारे पानीयों की मिठास’ में उनकी मुलाकातों का जिक्र है।
खुद राहत इंदौरी लिखते हैं ‘बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि मेरे राहत इंदौरी से डॉ. राहत इंदौरी बनने में भी अनवर भाई की ही कोशिशें हैं। बीए करने के बाद अनवर भाई के हुक्म और जिद से मैंने एमए का फार्म भरा। फारसी भी उन्होंने ही मुझे सिखाई। मैं एमए फर्स्ट क्लास पास हो गया ये खबर भी अनवर भाई ने किसी मुशायरे में ही मुझे दी। डॉ. जानिसार आलम बताते हैं कि अनवर जलालपुरी की दो किताबों के मुख्य पृष्ठ की डिजाइनिंग खुद डॉ. राहत इंदौरी ने ही की थी।
प्याज की पकौड़ियों के शौकीन और खूब मजाक करते थे
सर्वेश अस्थाना
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हास्य व्यंग्य कवि सर्वेश अस्थाना बताते हैं कि राहत भाई गजब के तफरीह पसंद शख्स थे। साल 2010 ताज महोत्सव कवि सम्मेलन मुशायरे की बात है। हम और राहत जी सवेरे ही आगरा पहुंच गए थे। दोपहर में राहत भाई बोले, चल सर्वेश मोहब्बत देख कर आते हैं। उनका इशारा ताज महल की तरफ था।
हम ताज के दीदार के बाद बाहर निकलने लगे। जमुना के दूसरी तरफ काले संगमरमर का भी ताज बनना था पर बहुत जरा सी तामीर हुई थी। तफरीहन वो बोले चल अब मेरे कलर वाला भी देखकर आते हैं। पहले तो मैं कुछ जान न सका, बाद में समझ आया तो हंसता रहा मन ही मन। हम लोग उस तरफ भी गए।
वहां कुछ लड़कियां भी थी जो पिकनिक मना रही थी, मैने उन लड़कियों को बता दिया कि बूमरो बूमरो... वाला गीत लिखने वाले राहत इंदौरी साहब यही हैं। फिर क्या था, उनसे ऑटोग्राफ की होड़ मच गई। उनकी शैतानियों को देख राहत साहब बोले, सर्वेश आगरे की लड़कियां हैं या आग.. रे। सर्वेश तू तो भाग रे..! उनसे 30 सालों से परिचय था। लखनऊ आने पर बिना मिले कहीं न जाते।
राहत नहीं चाहते थे कि कोरोना से मौत हो
मुनव्वर राणा
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डॉ. राहत इंदौरी से मेरे ताल्लुकात पचास साल से ज्यादा पुराने हैं। अभी फरवरी में ‘जश्न-ए- रेख्ता’ ने इस सिलसिले में एक प्रोग्राम भी कराया। राहत से मेरे ताल्लुक की गहराई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि जब उनकी मां का इंतकाल हुआ तो मुझे फोन किया और बोले, ‘मुनव्वर, इंतकाल की खबर देने को पहला और आखिरी फोन तुमको किया है।
अब मैं यतीम हो गया और तुम मेरे गम को समझ सकते हो।’ राहत फख्र से कहते थे कि अनवर राणा (मेरे वालिद) की बड़ी औलाद मैं हूं। उनके बेटे सुतलज की नौकरी का मामला था कि उससे बोले, मुझसे न कहो, अपने चाचा ( मुझसे) से बात करो। बहुत हक से उसने मदद मांगी तो इंदौर में अपने एक दोस्त से बात की।
उसने जिज्ञासावश सुतलज से पूछा, तुम राहत इंदौरी के बेटे हो। उसके जवाब देने से पहले मैं बोल पड़ा। दरअसल ये है मेरा बेटा, चूंकि इंदौर में रहता है तो मजबूरी में राहत इंदौरी को वालिद कहना पड़ता है। कोरोना से राहत को डर लगता था। अभी चंद रोज पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि मरना तो सभी को है पर मैं नहीं चाहता कि कोरोना से मौत हो।
क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे मरने के बाद लोग मेरे करीब न आएं। मेरी तो ख्वाहिश है कि मेरे अपने मुझे मिट्टी में दफन करके आएं। आज जब यह दर्दनाक खबर मिली तो मेरी तकलीफ का आप लोग अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। उनके दुनिया से रुखसत होने के बाद अब मेरा कोई बड़ा भाई नहीं बचा। पहले अनवर जलालपुरी और अब राहत इंदौरी...... पता नहीं इसे कैसे सहन कर पाऊंगा।
नवाज देवबंदी बोले, शायरी की दुनिया का बेताज बादशाह चला गया
नवाज देवबंदी
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मशहूर शायर नवाज देवबंदी का राहत इंदौरी के साथ 38 साल साथ रहा। वे कहते हैं कि राहत शायरी की दुनिया के बेताज बादशाह थे। उनसे तारीख पूछकर मुशायरों की तारीख तय की जाती थी। राहत से पहले तरन्नुम में पढ़ने वालों को ही शायर माना जाता था लेकिन राहत ने शायरी को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया जहां पर पहुंचना किसी के बस की बात नहीं है।
नवाज देवबंदी कहते हैं कि उनका अंदाज और लफ्जों की अदायगी ऐसी थी कि उन्होंने अपने पढ़ने के अंदाज को एक आर्ट बना दिया और राहत के जाने के साथ ही ये आर्ट भी उनके साथ ही चली गई। राहत के एक हाथ में बगावत का झंडा तो दूसरे में मोहब्बत का पैगाम रहा। उन्होंने दोनों तरह की शायरी को ही पूरी ईमानदारी के साथ निभाया।
अमूमन किसी शायर के चंद शेर ही उनकी पहचान बन जाते हैं लेकिन वो इकलौते शायर हैं जिनके सैकड़ों शेर लोगों की जुबान पर हैं। राहत साहब फिल्मी और शायरी की दुनिया में समान हैसियत रखते थे। राहत के जाने के साथ ही एक शायर नहीं गया बल्कि एक दौर का अंत हो गया।
नवाज देवबंदी ने बताया कि एक साल पहले दुबई के एक मुशायरे में वे उनके साथ बैठे थे तभी एक फोटोग्राफर वहां से गुजरे तो मैंने उन्हें रोककर कहा कि एक फोटो मेरा भी राहत साहब के साथ ले लो। इस पर राहत साहब जोर से हंसे और बोले, नवाज तुम्हें लगता है कि मैं मरने वाला हूं, इसलिए फोटो खिंचवाना चाहते हो। नवाज देवबंदी ने कहा, मुझे क्या पता था कि उनकी ये बात कुछ समय बाद ही सच साबित हो जाएगी।