कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मोहम्मद आतिफ भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन बम ब्लास्ट, प्रधानमंत्री की रैली में बम रखने की कोशिश या कानपुर के रमेश शुक्ला की हत्या में शामिल नहीं था। लिहाजा उसे फांसी देना उचित नहीं है लेकिन वह आतिफ मुजफ्फर का सहयोगी है और उसने हथियार व विस्फोटक इकट्ठा किए। इस तरह उसने भारत सरकार के खिलाफ युद्ध में भाग लिया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि दोषी अपनी कट्टर विचारधारा के लिए इतने समर्पित और मौत से बेखौफ हो चुके थे कि वह आत्मघाती हमलावर के रूप में कहीं भी हमला करने को तैयार थे। जब इन सबके सामने सुरक्षाबल आते हैं तो इन्हें मौत के भय की जगह जन्नत की खुशबू आने लगती है।
कोर्ट ने कहा कि इस देश में लोकतंत्र के प्रतीक के तौर पर जो रैलियां की जाती है, उनमें राजनेता भयमुक्त होकर जनता को संबोधित कर सकें और जनता भी भयमुक्त होकर शामिल हो सके, हर नागरिक भयमुक्त होकर सार्वजनिक परिवहन के साधनों जैसे ट्रेन इत्यादि में सफर कर सके देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कोई नुकसान न पहुंचा सके। इसके लिए दोषियों को मृत्युदंड से दंडित किया जाए।