वर्ष 1950 की 24 जनवरी को संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश नाम हुआ और बाद में पुनर्गठन कर उत्तर प्रदेश का मौजूदा स्वरूप तय किया गया। पर, वर्ष 1957 में योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष टीटी कृष्णमाचारी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के निदान के लिये विशेष ध्यान देने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 12 मई 1970 में पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान की जिम्मेदारी राज्य तथा केंद्र सरकार की होने की घोषणा की।
इसी के बाद 1979 में पृथक राज्य के गठन के लिए उत्तराखंड क्रांति दल बनाया गया। संघर्ष चलता रहा और नवंबर 1987 में पृथक उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए दिल्ली में प्रदर्शन और राष्ट्रपति को ज्ञापन दिए गए। वर्ष 1994 में अलग राज्य के लिए उत्तराखंड के छात्रों ने सामूहिक रूप से आंदोलन शुरू कर दिया पर, मुलायम सिंह यादव के तेवरों से आंदोलन उग्र हो गया।
अनशन हुए, तीन महीने से ज्यादा हड़ताल चली, उत्तराखंड में चक्काजाम और पुलिस फायरिंग की घटनाएं हुई। मुलायम सरकार में ही मसूरी व खटीमा में पुलिस ने गोलियां चलाई। कई लोग घायल हुए। दिल्ली में प्रदर्शन के लिए जाते हुए आंदोलनकारियों व पुलिस के बीच मुजफ्फरनगर में संघर्ष हुआ, कई लोग मारे गए। महिलाओं के साथ दुराचार और अभद्रता के आरोप भी लगे। यह संघर्ष रामपुर तिराहा कांड से चर्चित हुआ।
रामपुर तिराहा कांड के बाद आंदोलन और तेज हो गया। चुनाव आए तो भाजपा ने उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाने का वादा किया और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार ने विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज दिया। इसके फलस्वरूप 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से 13 जिलों को काटकर उत्तरांखड बनाया गया। पहले इसका नाम उत्तरांचल फिर उत्तराखंड कर दिया गया। उत्तर प्रदेश से लोकसभा की पांच सीटें भी उत्तराखंड में दी गई। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में 85 की जगह लोकसभा की 80 ही सीटें रह गईं।
उत्तर प्रदेश के 70 वर्षों के सफर में कई ऐसे बदलाव हुए जिन्होंने कुछ प्रमुख शहरों और नदियों को इतिहास का हिस्सा बना दिया। उदाहरण के लिए जो इलाहाबाद लंबे वक्त तक प्रदेश की राजधानी रहा उसका नाम अब बदल चुका है। अब वह अकबर से पहले के नाम अर्थात प्रयागराज नाम से जाना जाएगा। जिस फैजाबाद को सआदतअली खां ने अवध की राजधानी बनाया था, यह नाम भी बीते दिनों की बात बन गया। अब यह अयोध्या नाम से जाना जाएगा। यही नहीं जिस उत्तर प्रदेश में प्रमुख नदियों में अब तक घाघरा को भी पढ़ा जाता था उसे अब सरयू नाम से भावी पीढ़ी जानेगी।