सड़क किनारे चाय के ठेले पर जूठे बर्तन मांजते बच्चों को देखकर अक्सर हममें से कई लोगों को उनसे सहानुभूति का एहसास हुआ होगा। हो सकता है हमने, आपने ऐसे बच्चों की किसी तरह की मदद भी की हो। पेशे से शिक्षिका और रुमेटाइड अर्थराइटिस से पीड़ित लखनऊ की दिव्या शुक्ला ऐसे ही बच्चों को तालीम देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती हैं ताकि इनका भी जीवन खुशहाल हो सके।
दिव्या बताती हैं कि मेरे पिता आईपीएस अधिकारी थे। पूरे प्रदेश में अलग-अलग जगह उनका तबादला होता रहता था। जब उनकी बदली होती तो पूरा परिवार उनके साथ ही शिफ्ट होता। इस वजह से प्रदेश के अलग-अलग स्कूलों में मेरी पढ़ाई हुई।
मैं तीन भाइयों की इकलौती बहन हूं। इसलिए बचपन से ही सबकी दुलारी रही हूं। पापा ने कभी भी मुझे भाइयों से कम महत्व नहीं दिया। वे हमेशा मेरे हौसले बढ़ाते हुए कहते कि तुमको एक बेहतरीन इंसान बन कर मेरा नाम रोशन करना है। उन्होंने ही मुझे निशानेबाजी, घुड़सवारी, कबड्डी जैसे लड़कों के माने जाने वाले खेल सिखाए।
मैंने घर के आसपास रहने वाले गरीब बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाने का सिलसिला शुरू किया। दरअसल, जब भी किसी बच्चे को बर्तन मांजते या भीख मांगते देखती तो मुझे लगता कि बतौर शिक्षिका हमारा दायित्व है कि ऐसे बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जाए। इन्हें पढ़ाने का मकसद केवल शिक्षित करना ही नहीं बल्कि अपनी पीड़ा को भूलना भी था।
बचे समय में लिखतीं हैं किताब
बात उस वक्त की है जब मेरे पति की पोस्टिंग मुंबई में थी। वहां मैंने अपना समय गरीब मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने में व्यतीत करना शुरू किया। कुछ बच्चे तो ऐसे थे कि दिन भर मजदूरी करते और शाम को मेरी क्लास में आते।
मेरी क्लास में आने से उनका शिक्षा के प्रति नजरिया बदलना शुरू हुआ। हालांकि ये बहुत ही मुश्किल काम था, पर इसे करने में बहुत मजा आने लगा। पति के रिटायर होने के बाद हम गोमतीनगर में शिफ्ट हो गए। यहां भी पढ़ाने का अपना सफर मैंने जारी रखा।
एक खाली प्लाॅट पर स्कूल शुरू किया। अब मैं प्रारंभिक शिक्षा देकर बच्चों को दूसरे स्कूल में दाखिला करवा देती हूं, जिससे वे उच्च शिक्षा हासिल कर सकें। कुछ साल पहले मेरी एक स्टूडेंट स्काॅलरशिप लेकर पढ़ने विदेश गई थी।
महिलाओं को रोजगार परक शिक्षा मिले तभी उनका सशक्तीकरण हो सकेगा। इसी विचार से मैं पुस्तक लिखती हूं। एक किताब छप कर बहुत चर्चित हो चुकी है। जल्द ही दूसरी किताब पाठकों के हाथों में होगी।
सभी फैसलों में होती है घर वालों की सहमति
जिंदगी बहुत ही खुशहाल चल रही थी, तभी अचानक दुख के बादल आ गए। पापा डकैतों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए। मेरे परिवार में तो कोई ऐसे संकट के लिए तैयार ही नहीं था। मां ने आईटी कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया। मैं खुद एमए में पढ़ रही थी कि मां ने शादी करवा दी।
खुशकिस्मती थी कि पति देवीकांत शुक्ला और उनके परिवार ने मुझे बहुत सहारा दिया। मेरे सभी फैसलों में उनकी सहमति होती है। सब कुछ पटरी पर था तभी किस्मत ने एक बार फिर पलटा खाया। एक मार्ग दुर्घटना के बाद मुझे रुमेटाइड अर्थराइटिस हो गया। चलने-फिरने में बहुत परेशानी होती थी, हर वक्त जोड़ों का असहनीय दर्द मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया। शायद यही वो समय था जब मुझे दूसरों के दर्द का भी एहसास होने लगा।