इन तीनों मामलों में महिलाएं मध्यम आयुवर्ग की हैं। केस स्टडी बताती है कि इनमें एक बात कॉमन है कि ये सभी अपनी जगह सफल और हर काम को बेहतरीन तरीके से अंजाम देने वाली हैं। जिस काम को इन्होंने अपने हाथ में लिया, उसमें शत-प्रतिशत दिया।किसी काम को कभी ना नहीं कहा।
हालांकि, हर जिम्मेदारी को खुद पर ओढ़ लेना, खुद के लिए वक्त न दे पाना, बाहरी तामझाम के बीच खुद को कमतर आंकना या फिर दूसरों के जैसे होने की सोच और सबसे बढ़कर सबकुछ एकदम ‘परफेक्ट’ होने की चाह इन्हें मानसिक रूप से बीमार कर रही है। इसे मनोचिकित्सक ‘सुपरविमेन सिंड्रोम’ का नाम देते हैं।
केजीएमयू में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी बताते हैं कि हफ्ते में दो दिन ओपीडी में इस बीमारी के करीब 300 मरीज आते हैं। इसमें नए मरीजों की संख्या 30-40 होती है। इनमें 60 फीसदी महिला मरीज होती हैं। डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, इस बीमारी की शुरुआत कॉमन न्यूरोटिक डिसऑर्डर से होती है, जो उचित इलाज न होने पर सुपरविमेन सिंड्रोम में बदल जाती है। उच्च मध्यम वर्ग की महिलाएं ज्यादा इसकी चपेट में हैं।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रियंका जायसवाल कहती हैं कि रोजाना ओपीडी में 150 के करीब मरीज आते हैं, जिनमें से 70 महिलाएं होती हैं। 30-50 रेफर्ड केस होते हैं और नए केस 30-35 होते हैं। नए मरीजों में 50 फीसदी महिलाएं होती हैं। मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग की महिलाओं को यह सिंड्रोम ज्यादा शिकार बना रहा है।
मल्टीटास्किंग की गलत परिभाषा ने बिगाड़ा खेल
साइकोथेरेपिस्ट और बीबीएयू में चीफ साइकोलॉजिकल काउंसलर डॉ. नेहा आनंद कहती हैं कि महिलाओं पर घर-परिवार-दफ्तर की जिम्मेदारी, सोसाइटी के साथ कदमताल की कोशिश के साथ कई जिम्मेदारियों की तलवार लटक रही है।
दरअसल, मल्टीटास्किंग की मांग में वे खुद को समय देना भूल गईं और ‘सुपरविमेन’ का कैप पहन लिया, जो उन्हें नुकसान पहुंचा रहा है। वर्किंग विमेन जहां अपनी पद, प्रतिष्ठा से बंधी हैं तो गृहिणियों का भी दायरा बढ़ा है। अधिक सामाजिक होने, सोशल मीडिया पर उपस्थिति उन्हें खुद की तुलना करने का मौका दे रही है। दूसरों की तरह होने को बनाने की होड़ उनके व्यवहार को बदल रही है। जनवरी से अब तक 10 ऐसे केस आ चुके हैं, जिनमें ये लक्षण पाए गए।
प्रो. आदर्श त्रिपाठी कहते हैं कि जिस तरह समानता की भेड़चाल है, उसमें महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। महिलाएं पुरुषों से खुद की तुलना कर रही हैं, जबकि यह भूल जाती हैं कि वह खुद सक्षम हैं। इसी भेड़चाल ने उन पर साठ गुना तक तनाव बढ़ा दिया है।