पोस्टर, स्लोगन, नुक्कड़ नाटक आदि माध्यमों से वो लोगों को जागरूक करती है। उसने लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए न केवल जागरूक किया बल्कि प्राथमिक विद्यालयों में जाकर बच्चों को पढ़ाया भी। जो बच्चे अंग्रेजी का एक अक्षर तक बोल नहीं पाते थे उनमें अंग्रेजी के शब्द सीखने की ललक बढ़ गई। गणित आदि विषयों में बच्चों को बेसिक शिक्षा दी। साधना ने बताया कि इन स्कूलों में सारा जोर बच्चों की संख्या को बढ़ाने पर दिया जाता है। यदि गुणवत्ता में ही सुधार किया जाए तो बच्चों की संख्या अपने आप बढ़ जाएगी।
साधना ने अधिकांश जागरूकता कार्यक्रम मलिन बस्तियों में चलाए। खासकर महिला हिंसा और कन्या भ्रूण हत्या के प्रति लोगों को जागरूक किया। बैनर-पोस्टर और नुक्कड़ नाटकों के द्वारा लोगों को जागरूक किया। इसके अलावा इन बस्तियों में व्यापक स्तर पर स्वच्छता अभियान चलाकर लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया।
साधना ने बताया कि सामाज में योगदान देने के लिए बड़ा काम करने की जरूरत नहीं। छोटे-छोटे कदम उठाने से ही बड़े काम होते हैं। इसके लिए अपने घर और आसपास से ही शुरुआत की जा सकती है। उसने अपनी टीम के साथ कॉलेज के बाहर अभियान चलाकर गुटखा-पान की दुकानों को हटवाया। उसका मानना है कि इससे युवाओं का भविष्य बिगड़ रहा है। यही नहीं जिन दुकानों पर बाल श्रम कराया जा रहा था उनका बहिष्कार भी किया। उनकी टीम के इस प्रयास से बाकी लड़कियों ने भी सीख ली।