बुखार के साथ गले में लगातार खराश, सांस फूलना, छाती में दर्द, ध्यान केंद्रित न कर पाना, त्वचा पर लाल चकत्ते, हाथ-पैरों में कंपन, दर्द और कंधे में झटके लगना, जोड़ों और पैरों में सूजन, कमजोरी, दिल की धड़कन तेज या अनियमित होना आदि।
रुमेटिक हार्ट डिजीज के लक्षण
कार्डियो सर्जन डॉ. डीके श्रीवास्तव बताते हैं कि रुमेटिक फीवर में बच्चे को नियमित दवा देनी पड़ती है। कुछ दवाएं मर्ज ठीक होने पर भी ताउम्र लेनी पड़ती है। जो दवाएं नहीं लेते, धीरे-धीरे उनके दिल के वॉल्व खराब हो जाते हैं। ये वॉल्व वनवे डोर की तरह काम करते हैं। इससे हृदय द्वारा पंप किए जाने वाले खून का प्रवाह एक ही दिशा में होता है। वॉल्व क्षतिग्रस्त होने पर इनसे खून रिस सकता है। इलाज में देरी पर हार्ट के डैमेज होने की आशंका रहती है।
इस स्थिति में दिल के आसपास पानी जमा होने लगता है। इससे वॉल्व बहुत ढीले या कस जाते हैं। दोनों स्थितियों में वे सही से काम नहीं कर पाते और हृदय शरीर की जरूरत पूरा करने के लिए पर्याप्त खून पंप नहीं कर पाता। इसी तरह हृदय के क्षतिग्रस्त वॉल्वों में संक्रमण, दिल में खून का थक्का बनने से स्ट्रोक, क्षतिग्रस्त वॉल्वों का टूटना आदि समस्याएं होती हैं।
जहां पर्याप्त सफाई नहीं रहती उस क्षेत्र के बच्चों को बैक्टीरिया स्ट्रेप्टोकोकस चपेट में ले लेता है। इस संक्रमण को स्कारलेट फीवर भी कहा जाता है। इससे इम्यून सिस्टम असंतुलित हो जाता है। कुछ में आनुवंशिक कारण भी होते हैं।
यह है बचाव का तरीका
घर के आस-पास सफाई रखें। गले में संक्रमण के साथ 100 डिग्री के करीब बुखार हो तो तत्काल डॉक्टर को दिखाएं। संक्रमित बच्चे से अन्य को दूर रखें। मर्जी से दवाएं बंद ना करें। बुखार से दिल में समस्या शुरू हो गई है तो संबंधित दवा लें। आराम मिलने पर भी बिना डॉक्टर की अनुमति के दवा बंद ना करें।
बिना सीना खोले ही बदल देते हैं वॉल्व
डॉ. डीके श्रीवास्तव ने बताया कि वॉल्व बदलने के लिए अब हार्ट को खोलना नहीं पड़ता। हाथ के नीचे और छाती के पास छोटा सा छेद करके वॉल्व दुरुस्त किया जा सकता है। कुछ मामलों में वॉल्व को कृत्रिम वॉल्व से बदलना पड़ता है। इसके लिए हृदय के कक्षों (चैंबर) एवं वॉल्वों की जांच के लिए ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल होता है। इको से वॉल्व फ्लैप, वॉल्व लीक होने से रिसाव और हृदय का आकार बढ़ने की जानकारी मिल जाती है।