ओपी सिंह को लखनऊ में अरसे से चले आ रहे शिया-सुन्नी विवाद को सुलझाए जाने के लिए भी जाना जाता है। 1998 में उन्होंने दोनों पक्षों में समझौता कराकर 20 वर्ष से अधिक समय से प्रतिबंधित जुलूस निकलवाया था।
चार अधिकारियों को सुपरसीड कर बने डीजी
ओपी सिंह चार सीनियर आईपीएस अधिकारियों को सुपरसीड कर डीजीपी बने हैं। ग्रेडेशन लिस्ट के अनुसार सुलखान सिंह के रिटायर होने के बाद सबसे वरिष्ठ अधिकारी प्रवीण सिंह हैं। दूसरा नंबर डॉ. सूर्य कुमार का, तीसरा राजीव राय भटनागर और चौथा नंबर गोपाल गुप्ता का है। इनमें से राजीव राय भटनागर का कार्यकाल भी दो वर्ष का बचा है। ओपी सिंह का नाम अंतिम समय तक गोपनीय रखा गया।
शनिवार देर रात मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार और प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री एसपी गोयल की बैठक के बाद उनका नाम फाइनल किया गया और रात में ही ई-मेल से केंद्र सरकार को सूचना दी गई थी। प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार ने बताया कि नए डीजीपी के जॉइन करने तक एडीजी कानून-व्यवस्था आनंद कुमार के पास डीजीपी का चार्ज रहेगा।
उत्तर प्रदेश के नए डीजीपी ओपी सिंह क्रिकेट के शौकीन हैं। वे बिहार के गया जिला के चाकंद थानाक्षेत्र के गांव मीरा बिगहा के रहने वाले हैं। उनके गांव में आज जश्न का माहौल है। गांव के पूर्व मुखिया उमेश कुमार सिंह बताते हैं कि उनके चाचा ओमप्रकाश सिंह बचपन से ही क्रिकेट खेलने के शौकीन रहे हैं। पिता की मृत्यु के बाद प्रतिवर्ष उनकी याद में क्रिकेट टूर्नामेंट करवाते हैं। पिछले नौ दिसंबर को वे एक शादी समारोह में गांव आए थे और गांव वालों के साथ क्रिकेट खेला था।
ग्रामीण बताते हैं कि स्व. शिवधारी सिंह के दो पुत्रों में छोटे ओमप्रकाश शुरू से ही पढ़ने-लिखने में तेज रहे। गया जिला स्कूल से मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीए किया और दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए। दिल्ली में रहने के दौरान यूपीएससी की तैयारी शुरू की और साल 1973 में वे यूपी काडर से आईपीएस अफसर बने। 1974 में चीफ जस्टिस केवीएन सिंह की पुत्री से उनकी शादी हुई। उनके एक पुत्र व एक पुत्री है।
मां की तपस्या ने बनाया आईपीएस
उत्तर प्रदेश के नए पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह के बड़े भाई डॉ. प्रकाश सिंह ने पत्रकारों को बताया कि हम भाइयों की सफलता के पीछे हमारी मां की लंबी तपस्या है। गया में रहने वाले प्रकाश सिंह ने कहा, मैं एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा था। इसी बीच अचानक पिताजी का स्वर्गवास हो गया। उस समय उनके बैंक खाते में मात्र 603 रुपये थे। तब मां ने हमलोगों की पढ़ाई जारी रखने के लिए चाकन में खेतीबाड़ी का अपना काम देखना शुरू कर दिया। हमारी पढ़ाई के लिए उन्हें 10 वर्षों तक खेती करनी पड़ी।