फिल्म कहानीकार मनोहर श्याम जोशी ने जब जुगाड़ से शोधपत्र के सहारे खुद को लखनऊ विश्वविद्यालय से ‘कल का वैज्ञानिक’ घोषित करा लिया तो उनके हौसले बढ़ गए। वह खुद को विद्वान समझने लगे। कुछ साथी उनकी झूठी तारीफें करने लगे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि लोग उनकी तारीफ कर रहे हैं या खिंचाई।
जोशी जी प्रयास करते कि वह समय निकालकर पढ़ाई कर लें ताकि उनके विज्ञान का मेधावी छात्र बने रहने का भ्रम बना रहे। पर, कोई उनकी मेधा की तारीफ करते हुए चाय पिलाने का आग्रह करता तो कोई कॉफी की बात कहकर उनकी जेब हल्की कराता रहता।
जोशी चाहकर भी पढ़ाई न कर सके। ‘लखनऊ मेरा लखनऊ’ पुस्तक के संस्मरण से पता चलता है, ‘कल का वैज्ञानिक’ पुरस्कार मिलने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय के प्राध्यापकों का ध्यान जोशी जी की ओर गया।
वे उम्मीद करने लगे कि बैकबेंचर जोशी अब फ्रंटबेंचर हो जाएंगे। जोशी जी भी कोशिश करते कि किसी तरह प्रयास करके वह अपनी मेधा फ्रंटबेंचर वाली कर लें। पर, जोशी जी के साथियों ने तो जैसे उन्हें पढ़ने न देने की कसम खा ली थी।