लखनऊ। नवाबों के दौर से शुरू हुआ पतंगबाजी का शौक अब जानलेवा साबित हो रहा है। पतंगबाजी के बढ़ते कारोबार के बीच खतरनाक मांझे ने शहर की सड़कों को असुरक्षित बना दिया है। पिछले कुछ दिनों में हुए हादसों ने यह साबित कर दिया है कि यह केवल धागा नहीं, बल्कि सड़कों पर दौड़ता अदृश्य ''डेथ ट्रैप'' है।
पतंगबाजी का यह कारोबार अब विशाल उद्योग का रूप ले चुका है। अकेले लखनऊ में सालाना 100 करोड़ रुपये से अधिक की पतंग, सद्दी और मांझे का कारोबार होता है। यहां से निर्मित और संग्रहित माल न केवल उत्तर प्रदेश के पड़ोसी जिलों, बल्कि जयपुर, नागपुर, भोपाल और पटना तक सप्लाई किया जाता है।
कागज और पन्नी की पतंगों का बाजार
पतंग बाजार में अब बड़ा बदलाव आया है। आज बाजार के 80 प्रतिशत हिस्से पर पन्नी (प्लास्टिक) की पतंगों का कब्जा है, जबकि कागज की पतंगें 20 प्रतिशत तक सिमट गई हैं। कागज पर 12% और तैयार पतंग पर 5% जीएसटी के कारण कागज की पतंग महंगी (थोक में 5 रुपये से शुरू) पड़ती है, जबकि पन्नी की पतंगों पर केवल 5% जीएसटी है और ये थोक में 1 से 5 रुपये के बीच उपलब्ध है।
पहली बार कानपुर से उड़ी पन्नी की पतंग
पतंग विक्रेता एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष देवेंद्र गुप्ता के अनुसार, पन्नी की पतंग का जन्म वेस्ट मैनेजमेंट से हुआ। करीब 30 साल पहले कानपुर के नियामत अली ने रिजेक्टेड रैपर और पन्नियों से पतंग बनाकर इस उद्योग को नई दिशा दी। आज भी कानपुर पन्नी की पतंगों का सबसे बड़ा केंद्र है।
रोजगार का बड़ा केंद्र
लखनऊ रामपुर और बरेली की तरह ही पतंग उद्योग का गढ़ बन रहा है। सआदतगंज और चौपटिया के हजारों कारीगर साल भर इस काम में जुटे रहते हैं। हालांकि, कच्चा माल बाहर से आता है। सद्दी और सूती धागा सूरत से, जबकि मांझा बरेली और मुरादाबाद से मंगाया जाता है।
प्रमुख सीजन
दिवाली के बाद जमघट लखनऊ का सबसे बड़ा पतंग उत्सव है। इसके अलावा मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, 15 अगस्त और 26 जनवरी को मांग इतनी अधिक होती है कि आपूर्ति करना मुश्किल हो जाता है।
लखनऊ में पतंग कारोबार।
लखनऊ में पतंग कारोबार।
लखनऊ में पतंग कारोबार।
लखनऊ में पतंग कारोबार।
लखनऊ में पतंग कारोबार।
लखनऊ में पतंग कारोबार।
लखनऊ में पतंग कारोबार।