गाइडलाइन को मंजूरी देने के लिए एथिकल कमेटी में प्रस्ताव रखा गया है। कमेटी की मंजूरी के बाद गाइडलाइन के अनुसार, आयुर्वेद विशेषज्ञों से मदद ली जाएगी और उनकी सलाह पर जरूरत के हिसाब से मरीजों को आयुर्वेदिक दवाएं दी जाएंगी।
वेबिनार के जरिए दिल्ली स्थित चौधरी ब्रह्मप्रकाश चरक आयुर्वेदिक संस्थान के निदेशक व प्रिंसिपल डॉ. विदुला गुज्जरवार ने बताया कि सरकार के सहयोग से उनके चिकित्सा संस्थान में 114 कोरोना मरीजों को आयुर्वेद दवाओं से इलाज मुहैया कराया जा रहा है।
इसमें शंसमनी वटी, नागरादि कषाय व आमलकी चूर्ण समेत अन्य दवाएं दी जा रही हैं। इलाज के बाद 14 मरीजों की रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी है। बाकी मरीजों की तबीयत में भी सुधार आ रहा है।
कुलपति प्रो. एमएलबी भट्ट ने बताया कि कोरोना के बढ़ते प्रसार को देखते हुए सभी विधाओं को एक मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है। एलोपैथी के विशेषज्ञ मरीजों के इलाज में जुटे हैं लेकिन वैकल्पिक चिकित्सा पर भी विचार किया जा रहा है।
इसी के तहत आयुर्वेद के विशेषज्ञों से विमर्श किया गया है। इलाज से जुड़ा प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है। एथिकल कमेटी की संस्तुति के बाद उन विशेषज्ञों से परामर्श लिया जाएगा जो आयुर्वेद के जरिए इलाज कर रहे हैं।
यहां भर्ती होने वाले मरीजों में एलोपैथी का प्रयोग पहले की तरह जारी रहेगा। लेकिन आयुर्वेद में जो दवाएं कारगर है उन्हें भी मरीज की स्थिति के अनुसार प्रयोग किया जाएगा।
आयुष मंत्रालय से एक विस्तृत विवरण भी मांगा गया है। वेबिनार में कुछ विशेषज्ञों ने जलनेति एवं भस्त्रिका प्राणायाम को भी कारगर बताया है।
तिब्बिया कॉलेज के द्रव्यगुण विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शालिनी ने बताया कि उनके यहां आयुर्वेद से 95 मरीजों का इलाज चल रहा है। इन्हें एसिम्प्टोमैटिक, माइल्ड एवं सीवियर कैटेगरी में बांटकर उनकी स्थिति के अनुसार दिनचर्या, आहार, चिकित्सा तथा अन्य आयुर्वेद के योगों के अनुसार उपचार किया जा रहा है।
इस दौरान होम्योपैथी के डॉ. बीएन सिंह ने बताया कि होम्योपैथ में आर्सेनिक एल्बम को कोराना में कारगर पाया गया है।