केजीएमयू के प्रॉस्थोडॉन्टिक्स विभाग के डॉक्टरों ने बायीं आंख के कैंसर से पीड़ित बाराबंकी निवासी एक बुजुर्ग (60) को नया चेहरा दिया है। मरीज की पहले कैंसर से रोशनी छिन गई। इसके बाद ट्यूमर बढ़ता गया और आंख बंद होने के साथ बाहर आ गई।
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बुजुर्ग इलाज के लिए पहुंचा तो आंख में कैंसर भीतर तक फैल चुका था। ओरल कैंसर सर्जरी विभाग में उसकी आंख को निकाल दिया गया। आंख निकालने के बाद गड्ढा बन गया और आंख के आसपास के हिस्से में विकृति आ गई।
बुजुर्ग को इससे राहत दिलाने के लिए डॉक्टरों ने दो महीने की जटिल प्रक्रिया में सिलिकॉन प्रॉस्थोसिस से नकली आंख लगाकर जगह को भरा और चेहरे की विकृति दूर की। अब मरीज स्वस्थ है और घर पर सामान्य जीवन जी रहा है।
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30 हजार रुपये का इलाज निशुल्क
डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल बताते हैं कि सिलिकॉन मैटेरियल से बनी कृत्रिम आंख पर महज एक से डेढ़ हजार रुपये का खर्च आता है। मरीज को असाध्य रोग के तहत उसको सहायता राशि मिली हुई है तो इलाज पूरी तरह मुफ्त होता है।
लखनऊ में इस तरह के इलाज की सुविधा किसी निजी या सरकारी संस्थान में नहीं है। कुछ चुनिंदा निजी सेंटरों में पत्थर की आंख लगाई जाती है जिसके लिए 35 से 40 हजार रुपये चुकाने पड़ते हैं।
ऐसे बनाई गई नकली आंख
डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल
- फोटो : amar ujala
विभाग के डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल ने बताया कि आंख निकालने के बाद जो भीतरी हिस्सा बचता है उसे ‘ऑरबिट’ कहते हैं। इस गड्ढे को भरने के लिए सबसे पहले ऑरबिटल डिफेक्ट का नाप लेकर डुप्लीकेट मॉडल बनाया गया और वैक्स से नकली आंख का पैटर्न बनाया गया। वैक्स पैटर्न को खाली ऑरबिट में फिक्स किया गया।
वैक्स पैटर्न को फिक्स करते वक्त ये सावधानी बरती गई कि वैक्स में बनी रेटिना (पुतली) ठीक आंख की पुतली के बराबर हो। इसके लिए दायीं आंख का नाप लिया गया और नाप सही आने के बाद सिलिकॉन मैटेरियल से कृत्रिम आंख बनाई गई और ऑरबिट में फिक्स कर दिया गया।
डॉ. कौशल बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में पीड़ित को सात से आठ बार विभाग आना पड़ा। सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख को फिक्स किया गया तो उसके चेहरे के आसपास के हिस्से में विकृति साफ नजर आ रही थी। इसे देखते हुए सिलिकॉन मैटेरियल से ही विकृति को भी दूर किया गया। अब बुजुर्ग का चेहरा बिल्कुल सामान्य दिख रहा है।
पत्थर की तरह भारी नहीं होती सिलिकॉन की आंख
सिलिकॉन की आंख
- फोटो : amar ujala
सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख में लचीलापन होता है और वो पत्थर की तरह भारी और कष्टदायक नहीं होती है। सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख सामान्य आंख की पुतली जैसी दिखती है।
डॉ. कौशल के मुताबिक, सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख को सामान्य आंख की तरह ढालना और फिक्स करना सबसे चुनौतीपूर्ण काम होता है और इसमें बहुत समय लगता है।
कान व अंगुली भी बन सकता है
डॉ. कौशल बताते हैं कि किसी हादसे में आंख, कान या अंगुली अलग हो जाए तो प्रॉस्थोडॉन्टिक्स विभाग में प्रोस्थोसिस की मदद से नया लगाया जा सकता है।
सिलिकॉन मैटेरियल से कृत्रिम कान और अंगुली आसानी से बनाए जा सकते हैं। कान के लिए सिलिकॉन के साथ मैग्नेटिक इंप्लांट इस्तेमाल होता है जिससे जरूरत के हिसाब से निकाला और लगाया जा सकता है। ये अंग बहुत फ्लेक्सिबल होते हैं।
केजीएमयू, डेंटल विभाग के डिप्टी एमएस डॉ. एसके जरेल बताते हैं कि आंख में बिना डॉक्टरी सलाह के दवा डालना खतरनाक है। देखा गया है कि लोग आंख में दर्द, जलन और लालपन आने पर खुद से या केमिस्ट से दवा खरीदकर इलाज करते हैं। दवा डालते ही आंख से धुंधला दिखाई देने लगता है। धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगती है।
दवा का असर आंख की रेटिना, ऑप्टिक नर्व और दूसरे हिस्सों को इतना बुरी तरह प्रभावित कर देता है कि आंख के भीतर ट्यूमर बनने के साथ वो बाहर आ जाती है जिसे मेडिकल की भाषा में रेटिना ब्लास्टोमा कहा जाता है।
डॉ. एसके जरेल बताते हैं कि आंख के कैंसर से पीड़ित बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। हर महीने पांच से छह बच्चे विभाग में प्रॉस्थोसिस लगाने के लिए आते हैं। बच्चों में ये बीमारी जन्मजात है।
बड़ों में इस तरह के मामले दवा के संक्रमण या अन्य कारणों से होते हैं। 30 वर्ष से अधिक उम्र के मरीज भी प्रॉस्थोसिस के लिए हर महीने सात से आठ की संख्या में पहुंचते हैं। आंख में जरा सी दिक्कत महसूस होने पर तुरंत नेत्र चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।
ये लक्षण दिखते ही हो जाएं सतर्क
- आंखों तेज दर्द शुरू होना
- लाल होने के साथ चुभन
- रोशनी तेजी से कम होना
- अचानक धुंधला दिखना
- लगातार आंसू आना