पं. बृजनारायण चकबस्त, पं. आनंद नारायण मुल्ला, पंडित रतननाथ सरसार, पंडित दयाशंकर नसीम, स्वरूप कुमारी बख्शी... ये वे नाम हैं, जिन पर लखनऊ को फख्र है। इस शहर की नजाकत, नफासत, रवायत को इन्होंने पहचान दी और एक मुकाम तक पहुंचाया। हालांकि, आपको यह जानकर हैरत होगी कि ये सभी कश्मीरी हैं, जो लखनऊ आए और यहीं के होकर रह गए।
लखनऊ की फिजा में घुली कश्मीरियत की खुशबू इन कश्मीरी पंडितों व मुसलमानों से ही है। इतिहासकार योगेश प्रवीण ने बताया कि जब लखनऊ को बसाया गया तो दो तरह के कश्मीरी यहां आकर बसे। कश्मीरी पंडित और कश्मीरी मुसलमान। कश्मीरी पंडितों ने कश्मीरी मुहल्ले में आशियाने बनाए, जबकि मुसलमानों ने शाहगंज में। दरअसल, कश्मीरी पहले फैजाबाद गए, जहां उनके पुरखे बसे। फिर जब 1774 में नवाब आसिफुद्दौला ने फैजाबाद को छोड़कर लखनऊ को राजधानी बना लिया तो सारे यहां आ गए।
बताया कि पंडित रतननाथ सरसार ने किताब ‘फसाना-ए-आजाद’ उर्दू में थी, जिसका मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी में अनुवाद किया और नाम रखा ‘आजाद कथा’। नवल किशोर प्रेस में इसे छापा गया था। पंडित दयाशंकर नसीम, पं. बृजनारायण चकबस्त, पं. आनंद नारायण मुल्ला भी कश्मीरी ब्राह्मणों के घराने थे। गोलागंज में लाल कोठी आनंद नारायण मुल्ला का निवास है। इतिहासकार ने बताया कि दयाशंकर नसीम ने उर्दू शायरी के गुर सरायमाले खां में रहने वाले शायर आतिश से ही सीखे।