चार साल की उम्र में एक रेल दुर्घटना में अपने दोनों हाथ और बाएं पैर की पांचों उंगलियां गंवाने के बावजूद साहित्य सृजन में निशक्तता को कभी आड़े नहीं आने दिया।
जोश और जज्बे की मिसाल कायम करते हुए काकोरी में बाल विकास परियोजना अधिकारी कामिनी श्रीवास्तव ने अपनी दूसरी किताब और कहानी संग्रह ‘डोर’ पैरों से लिखकर पूरी की। इसका विमोचन सोमवार को हिंदी संस्थान के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शंभूनाथ ने किया।
प्रेसक्लब में आयोजित विमोचन समारोह में मौजूद कामिनी श्रीवास्तव ने बताया कि अपनी नौकरी के साथ ही इन कहानियों को उन्होंने लिखा। पैरों की मदद से लेखन करने वाली कामिनी इससे पहले एक काव्य संग्रह ‘खिलते फूल, महकता आंगन’भी लिख चुकी हैं।