भले ही चुनाव प्रचार के लिए नेताओं को अब हेलीकॉप्टर से लेकर चार्टर्ड प्लेन तक आसानी से उपलब्ध हों, पर शुरू से ही ऐसा नहीं था। नेताओं को एक-एक सभा को संबोधित करने के लिए कई-कई किलोमीटर सड़क मार्ग से चलना पड़ता था।
बात 1980 से पहले के किसी चुनाव की है। प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे स्व. कल्याण सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश वाजपेयी को बताया था कि पीलीभीत के किसी दूर-दराज इलाके में एक कस्बे में सुबह 11 बजे सभा थी। जब पीलीभीत पहुंचा तो शाम हो चुकी थी। वहां एक सज्जन मोटर साइकिल लिए इंतजार कर रहे थे।
तय कार्यक्रम के अनुसार रुकने की व्यवस्था उस कस्बे से कुछ दूर पहले एक गांव में एक कार्यकर्ता के यहां कराई गई थी। पर, पीलीभीत से बमुश्किल 10 किलोमीटर ही आगे बढ़ पाया था कि मोटर साइकिल पंक्चर हो गई। शाम का समय था। आसपास पंक्चर ठीक करने वाला कोई नहीं...।
ऊपर से जाड़े का वक्त। चिंता थी कि सुबह सभा का क्या होगा। तभी सामने से एक टैंपो आता दिखा। उसे रोका तो वह पूरा भरा था। पीछे जो कैरियर लगा था उस पर दूध की केन और साइकिलें बंधी थीं। पहुंचना जरूरी था, इसलिए मैं एक हाथ में अटैची लेकर उसी कैरियर पर खड़ा हो गया।
मोटर साइकिल वहीं छोड़ वह कार्यकर्ता भी उसी पर खड़ा हुआ। पर, वह टैंपो भी कुछ दूर जाकर एक गांव में रुक गया। वह कार्यकर्ता जैसे-तैसे एक साइकिल की व्यवस्था करके लाया। उसी से हम लोग उस गांव पहुंचे जहां रुकना था। तब जाकर अगले दिन सभा हो पाई।